" मेरा पूरा प्रयास एक नयी शुरुआत करने का है। इस से विश्व- भर में मेरी आलोचना निश्चित है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता "

"ओशो ने अपने देश व पूरे विश्व को वह अंतर्दॄष्टि दी है जिस पर सबको गर्व होना चाहिए।"....... भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, श्री चंद्रशेखर

"ओशो जैसे जागृत पुरुष समय से पहले आ जाते हैं। यह शुभ है कि युवा वर्ग में उनका साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है।" ...... के.आर. नारायणन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति,

"ओशो एक जागृत पुरुष हैं जो विकासशील चेतना के मुश्किल दौर में उबरने के लिये मानवता कि हर संभव सहायता कर रहे हैं।"...... दलाई लामा

"वे इस सदी के अत्यंत अनूठे और प्रबुद्ध आध्यात्मिकतावादी पुरुष हैं। उनकी व्याख्याएं बौद्ध-धर्म के सत्य का सार-सूत्र हैं।" ....... काज़ूयोशी कीनो, जापान में बौद्ध धर्म के आचार्य

"आज से कुछ ही वर्षों के भीतर ओशो का संदेश विश्वभर में सुनाई देगा। वे भारत में जन्में सर्वाधिक मौलिक विचारक हैं" ..... खुशवंत सिंह, लेखक और इतिहासकार

प्रकाशक : ओशो रजनीश | बुधवार, जून 16, 2010 | 2 टिप्पणियाँ


सभी धर्म तुमसे अपने अहंकार को छोड़ने के बाबत कहते रहे हैं, लेकिन यह एक बड़ी विचित्र बात है: वे चाहते हैं, तुम अपना अहंकार छोड़ दो, और अहंकार सिर्फ परमात्मा की छाया की है। परमात्मा पूरे विश्व का अहंकार है, अहंकार तुम्हारा व्यक्तित्व है। धर्मों के अनुसार जैसे परमात्मा इस अस्तित्व का केंद्र है, इसी भांति अहंकार, तुम्हारे व्यक्तित्व और तुम्हारे मन का भी केंद्र है। वे सभी अहंकार को छोड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन यह तब तक नहीं छोड़ा जा सकता है, जब तक कि परमात्मा को ही न छोड़ दिया जाए। तुम एक छाया या प्रतिबिंब को तब तक नहीं छोड़ सकते जब तक कि उसके प्रत्यक्ष स्रोत को ही नष्ट न कर दिया जाए।

इसलिए सदियों से सभी धर्म यह निरंतर कहते आ रहे हैं कि तुम्हें अपने अहंकार से मुक्त हो जाना चाहिए, लेकिन ऐसा वे गलत कारणों से कह रहे हैं। वे सभी अहंकार छोड़ने के लिए इस लिए कह रहे हैं, ताकि तुम परमात्मा को समर्पित हो सको, जिससे तुम पुरोहितों को समर्पण कर सको, जिससे तुम किसी भी तरह के व्यर्थ के अंधविश्वासों, धर्मशास्रों और किसी भी भांति की विश्वास पद्धति के प्रति समर्पित हो सको।

लेकिन अगर यह अहंकार परमात्मा का ही एक प्रतिबिंब है, तो तुम उसे छोड़ नहीं सकते। पूरे विश्व में सर्वत्र परमात्मा एक झूठ की भांति व्याप्त है, और इसी तरह तुम्हारे मन में भी अहंकार एक झूठ की भांति विद्यमान है। तुम्हारा मन अपने कद के अनुसार एक बड़े झूठ को प्रतिबिंबित कर रहा है।

धर्मों ने मनुष्यता को एक बहुत बड़ी दुविधा में डाल रखा है: वे परमात्मा की प्रशंसा और अहंकार की निंदा किए चले जाते हैं। इसलिए लोग एक खंडित स्थिति में बने रहे। उनके विचारों,कार्यों और अनुभवों के बीच कोई संबंध न रहा और वे मानसिक रूप से रुग्ण हो गए। उन्होंने अहंकार को छोड़ने का कठोर प्रयास किया, लेकिन जितना वे छोडने का प्रयास करते, उसे छोड़ना उतना ही अधिक कठिन हो गया, क्योंकि उसे छोड़ने वाला था कौन? अहंकार स्वयं अपने को छोड़ने का प्रयास कर रहा था, जो असंभव था। इसीलिए तथाकथित धार्मिक लोगों में, जो सबसे अधिक विनम्र होते हैं, उनमें भी अहंकार बहुत सूक्ष्म हो जाता है, लेकिन वह गिरता नहीं है। तुम संतों की आंखों में देख सकते हो

2 पाठको ने कहा ...

  1. क्या बात है ? बहुत अच्छा

  2. आभार आप सभी पाठको का ....
    सभी सुधि पाठको से निवेदन है कृपया २ सप्ताह से ज्यादा पुरानी पोस्ट पर टिप्पणिया न करे
    और अगर करनी ही है तो उसकी एक copy नई पोस्ट पर भी कर दे
    ताकि टिप्पणीकर्ता को धन्यवाद दिया जा सके

    ओशो रजनीश

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