" मेरा पूरा प्रयास एक नयी शुरुआत करने का है। इस से विश्व- भर में मेरी आलोचना निश्चित है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता "

"ओशो ने अपने देश व पूरे विश्व को वह अंतर्दॄष्टि दी है जिस पर सबको गर्व होना चाहिए।"....... भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, श्री चंद्रशेखर

"ओशो जैसे जागृत पुरुष समय से पहले आ जाते हैं। यह शुभ है कि युवा वर्ग में उनका साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है।" ...... के.आर. नारायणन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति,

"ओशो एक जागृत पुरुष हैं जो विकासशील चेतना के मुश्किल दौर में उबरने के लिये मानवता कि हर संभव सहायता कर रहे हैं।"...... दलाई लामा

"वे इस सदी के अत्यंत अनूठे और प्रबुद्ध आध्यात्मिकतावादी पुरुष हैं। उनकी व्याख्याएं बौद्ध-धर्म के सत्य का सार-सूत्र हैं।" ....... काज़ूयोशी कीनो, जापान में बौद्ध धर्म के आचार्य

"आज से कुछ ही वर्षों के भीतर ओशो का संदेश विश्वभर में सुनाई देगा। वे भारत में जन्में सर्वाधिक मौलिक विचारक हैं" ..... खुशवंत सिंह, लेखक और इतिहासकार

प्रकाशक : ओशो रजनीश | शनिवार, जून 26, 2010 | 3 टिप्पणियाँ


पी.डी.आस्पेंस्की ने एक किताब लिखी है। किताब का नाम है, टर्शियम आर्गानम। किताब के शुरू में उसने एक छोटा सा वक्तव्य दिया है। पी.डी.आस्पेंस्की रूस का एक बहुत बड़ा गणितज्ञ था। बाद में, पश्चिम के एक बहुत अदभुत फकीर गुरजिएफ के साथ वह एक रहस्यवादी संत हो गया। लेकिन उसकी समझ गणित की है-गहरे गणित की। उसने अपनी इस अदभुत किताब के पहले ही एक वक्तव्य दिया है, जिसमें उसने कहा है कि दुनिया में केवल तीन अदभुत किताबें हैं; एक किताब है अरिस्टोटल की-पश्चिम में जो तर्क-शास्त्र का पिता है, उसकी-उस किताब का नाम है: आर्गानम। आर्गानम का अर्थ होता है, ज्ञान का सिद्धांत। फिर आस्पेंस्की ने कहा है कि दूसरी महत्वपूर्ण किताब है रोजर बैकन की, उस किताब का नाम है: नोवम आर्गानम-ज्ञान का नया सिद्धांत। और तीसरी किताब वह कहता है मेरी है, खुद उसकी, उसका नाम है: टर्शियम आर्गानम-ज्ञान का तीसरा सिद्धांत। और इस वक्तव्य को देने के बाद उसने एक छोटी सी पंक्ति लिखी है जो बहुत हैरानी की है। उसमें उसने लिखा है, बिफोर दि फर्स्ट एक्झिस्टेड, दि थर्ड वाज़। इसके पहले कि पहला सिद्धांत दुनिया में आया, उसके पहले भी तीसरा था। पहली किताब लिखी है अरस्तू ने दो हजार साल पहले। दूसरी किताब लिखी है तीन सौ साल पहले बैकन ने। और तीसरी किताब अभी लिखी गई है कोई चालीस साल पहले। लेकिन आस्पेंस्की कहता है कि पहली किताब थी दुनिया में उसके पहले तीसरी किताब मौजूद थी। और तीसरी किताब उसने अभी चालीस साल पहले लिखी है! जब भी कोई उससे पूछता कि यह क्या पागलपन की बात है? तो आस्पेंस्की कहता कि यह जो मैंने लिखा है, यह मैंने नहीं लिखा, यह मौजूद था, मैंने सिर्फ उदघाटित किया है। न्यूटन नहीं था, तब भी जमीन में ग्रेविटेशन था। तब भी जमीन पत्थर को ऐसे ही खींचती थी जैसे न्यूटन के बाद खींचती है। न्यूटन ने ग्रेविटेशन के सिद्धांत को रचा नहीं, उघाड़ा। जो ढंका था, उसे खोला। जो अनजाना था, उसे परिचित बनाया। लेकिन न्यूटन से बहुत पहले ग्रेविटेशन था, नहीं तो न्यूटन भी नहीं हो सकता था। ग्रेविटेशन के बिना तो न्यूटन भी नहीं हो सकता, न्यूटन के बिना ग्रेविटेशन हो सकता है। जमीन की कशिश न्यूटन के बिना हो सकती है, लेकिन न्यूटन जमीन की कशिश के बिना नहीं हो सकता। न्यूटन के पहले भी जमीन की कशिश थी, लेकिन जमीन की कशिश का पता नहीं था। आस्पेंस्की कहता है कि उसका तीसरा सिद्धांत पहले सिद्धांत के भी पहले मौजूद था। पता नहीं था, यह दूसरी बात है। और पता नहीं था, यह कहना भी शायद ठीक नहीं। क्योंकि आस्पेंस्की ने अपनी पूरी किताब में जो कहा है, वह इस छोटे से सूत्र में गया है। आस्पेंस्की की टर्शियम आर्गानम जैसी बड़ी कीमती किताब... मैं भी कहता हूं कि उसका दावा झूठा नहीं है। जब वह कहता है कि दुनिया में तीन महत्वपूर्ण किताबें हैं और तीसरी मेरी है, तो किसी अहंकार के कारण नहीं कहता। यह तथ्य है। उसकी किताब इतनी ही कीमती है। अगर वह कहता, तो वह झूठी विनम्रता होती। वह सच कह रहा है। विनम्रतापूर्वक कह रहा है। यही बात ठीक है। उसकी किताब इतनी ही महत्वपूर्ण है। लेकिन उसने जो भी कहा है पूरी किताब में, वह इस छोटे से सूत्र में गया है। उसने पूरी किताब में यह सिद्ध करने की कोशिश की कि दुनिया में दो तरह के गणित हैं। एक गणित है, जो कहता है, दो और दो चार होते हैं। साधारण गणित है। हम सब जानते हैं। साधारण गणित कहता है कि अगर हम किसी चीज के अंशों को जोड़ें, तो वह उसके पूर्ण से ज्यादा कभी नहीं हो सकते। साधारण गणित कहता है, अगर हम किसी चीज को तोड़ लें और उसके टुकड़ों को जोड़ें, तो टुकड़ों का जोड़ कभी भी पूरे से ज्यादा नहीं हो सकता है। यह सीधी बात है। अगर हम एक रुपए को तोड़ लें सौ नए पैसे में, तो सौ नए पैसे का जोड़ रुपए से ज्यादा कभी नहीं हो सकता। या कि कभी हो सकता है? अंश का जोड़ कभी भी अंशी से ज्यादा नहीं हो सकता, यह सीधा सा गणित है। लेकिन आस्पेंस्की कहता है, एक और गणित है, हायर मैथमेटिक्स। एक और ऊंचा गणित भी है और वही जीवन का गहरा गणित है। वहां दो और दो जरूरी नहीं है कि चार ही होते हों। कभी वहां दो और दो पांच भी हो जाते हैं। और कभी वहां दो और दो तीन भी रह जाते हैं। और वह कहता है कि कभी-कभी अंशों का जोड़ पूर्ण से ज्यादा भी हो जाता है।

ओशो

3 पाठको ने कहा ...

  1. Amitraghat says:

    "बहुत ही बेहतरीन पोस्ट....और भी लिखिए इस सम्बन्ध में ओशो के बारे में........"

  2. Sachin says:

    good , kya aap bata sakte hai ki hindi me kaise likhe .

  3. आभार आप सभी पाठको का ....
    सभी सुधि पाठको से निवेदन है कृपया २ सप्ताह से ज्यादा पुरानी पोस्ट पर टिप्पणिया न करे
    और अगर करनी ही है तो उसकी एक copy नई पोस्ट पर भी कर दे
    ताकि टिप्पणीकर्ता को धन्यवाद दिया जा सके

    ओशो रजनीश

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