" मेरा पूरा प्रयास एक नयी शुरुआत करने का है। इस से विश्व- भर में मेरी आलोचना निश्चित है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता "

"ओशो ने अपने देश व पूरे विश्व को वह अंतर्दॄष्टि दी है जिस पर सबको गर्व होना चाहिए।"....... भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, श्री चंद्रशेखर

"ओशो जैसे जागृत पुरुष समय से पहले आ जाते हैं। यह शुभ है कि युवा वर्ग में उनका साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है।" ...... के.आर. नारायणन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति,

"ओशो एक जागृत पुरुष हैं जो विकासशील चेतना के मुश्किल दौर में उबरने के लिये मानवता कि हर संभव सहायता कर रहे हैं।"...... दलाई लामा

"वे इस सदी के अत्यंत अनूठे और प्रबुद्ध आध्यात्मिकतावादी पुरुष हैं। उनकी व्याख्याएं बौद्ध-धर्म के सत्य का सार-सूत्र हैं।" ....... काज़ूयोशी कीनो, जापान में बौद्ध धर्म के आचार्य

"आज से कुछ ही वर्षों के भीतर ओशो का संदेश विश्वभर में सुनाई देगा। वे भारत में जन्में सर्वाधिक मौलिक विचारक हैं" ..... खुशवंत सिंह, लेखक और इतिहासकार


एक छोटे से मजाक से महाभारत पैदा हुआ। एक छोटे से व्यंग से, द्रौपदी के कारण जो दुर्योधन के मन में तीर की तरह चुभ गया और द्रौपदी नग्न की गई। नग्न् कि गई; हुई नहीं—यह दूसरी बात है। करने वाले ने कोई कोर-कसर न छोड़ी थी। करने वालों ने सारी ताकत लगा दी थी। लेकिन फल आया नहीं, किए हुए के अनुकूल नहीं आया फल—यह दूसरी बात हे।

असल में, जो द्रौपदी को नग्न करना चाहते थे, उन्होंने ख्याल रख छोड़ा था। उनकी तरफ से कोई कोर कसर न थी। लेकिन हम सभी कर्म करने वालों को, अज्ञात भी बीच में उतर आता है। इसका कभी कोई पता नहीं है। वह जो कृष्ण की कथा है, वह अज्ञात के उतरने की कथा है। अज्ञात के हाथ है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ते।


हम ही नहीं है इस पृथ्वी पर। मैं अकेला नहीं हूं। मेरी अकेली आकांक्षा नहीं हे। अनंत आकांक्षा है। और अंनत की भी आंकाक्षा है। और उन सब के गणित पर अंतत: तय होता है कि क्या हुआ। अकेला दुर्योधन ही नहीं है नग्न करने में, द्रौपदी भी तो है जो नग्न की जा रही है। द्रौपदी की भी तो चेतना है, द्रौपदी का भी तो अस्तित्व है। और अन्याय होगा यह कि द्रौपदी वस्तु की तरह प्रयोग की जाए। उसके पास भी चेतना है और व्यक्तिव है, उसके पास भी संकल्प है। साधारण स्त्री नहीं है द्रौपदी।


सच तो यह है कि द्रौपदी के मुकाबले की स्त्री पूरे विश्व के इतिहास में दूसरी नहीं है। कठिन लगेगी बात। क्यों कि याद आती है सीता की, याद आती सावित्री की याद आती है सुलोचना की और बहुत यादें है। फिर भी मैं कहता हुं, द्रौपदी का कोई मुकाबला ही नहीं है। द्रौपदी बहुत ही अद्वितीय है। उसमें सीता की मिठास तो है ही, उसमें क्लियोपैट्रा का नमक भी है। उसमें क्लियोपैट्रा का सौंदर्य तो है ही, उस में गार्गी का तर्क भी है। असल में पूरे महाभारत की धुरी द्रौपदी है। यह सारा युद्ध उसके आस पास हुआ है।


लेकिन चूंकि पुरूष कथाएं लिखते हे। इसलिए कथाओं में पुरूष-पात्र बहुत उभरकर दिखाई पड़ते है। असल में दुनिया की कोई महाकथा स्त्री की धुरी के बिना नहीं चलती है। सब महाकथाएं स्त्री की धुरी पर घटित होती है। वह बड़ी रामायण सीता की धुरी पर घटित हुई है। राम और रावण तो ट्राएंगल के दो छोर है, धुरी तो सीता है।

ये कौरव और पांडव और यह सारा महाभारत और यह सारा युद्ध द्रौपदी की धुरी पर घटा हे। उस युग की और सारे युगों की सुंदर तम स्त्री है वह। नहीं आश्चर्य नहीं है कि दुर्योधन ने भी उसे चाहा हो। असल में उस युग में कौन पुरूष होगा जिसने उसे न चाहा हो। उसका अस्तित्व, उसके प्रति चाह पैदा करने वाला था। दुर्योधन ने भी उसे चाहा हे और वह चली गई अर्जुन के पास।

और वह भी बड़े मजे की बात है कि द्रौपदी को पाँच भाइयों में बांटना पडा। कहानी बड़ी सरल हे। उतनी सरल घटना नहीं हो सकती। कहानी तो इतनी ही सरल है कि अर्जुन ने आकर बाहर से कहा कि मां देखो, हम क्या ले आए है। और मां ने कहा, जो भी ले आए हो वह पांचों भाई बांट लो। लेकिन इतनी सरल घटना हो नहीं सकती। क्यों कि जब बाद में मां को भी तो पता चला होगा। कि यह मामला वस्तु का नहीं, स्त्री का है। यह कैसे बाटी जा सकती है। तो कौन सी कठिनाई थी कि कुंती कह देती कि भूल हुई। मुझे क्या् पता था कि तूम पत्नी ले आए हो।

लेकिन मैं जानता हूं कि जो संघर्ष दुर्योधन और अर्जुन के बीच होता, वह संघर्ष पाँच भाइयों के बीच भी हो सकता था। द्रौपदी ऐसी थी, वे पाँच भी कट-मर सकते थे उसके लिए। उसे बांट देना ही सुगमंतम राजनीति थी। वह घर भी कट सकता था।

वह महायुद्ध जो पीछे कौरवों-पांडवों में हुआ, वह पांडवों-पांडवों में भी हो सकता था।

इसलिए कहानी मेरे लिए इतनी सरल नहीं है। कहानी बहुत प्रतीकात्मपक है और गहरी है। वह यह खबर देती है कि स्त्री वह ऐसा थी। कि पाँच भाई भी लड़ सकते थे। इतनी गुणी थी। साधारण नहीं थी। असाधारण थी। उसको नग्न करना आसान बात नहीं थी। आग से खेलना था। तो अकेला दुर्योधन नहीं है कि नग्न कर ले। द्रौपदी भी है।

और ध्यान रहे, बहुत बातें है इसमें, जो खयाल में ले लेने जैसी है। जब तक कोई स्त्री स्वय नग्न न होना चाहे, तक इस जगत में कोई पुरूष किसी स्त्री को नग्न नहीं कर सकता है, न हीं कर पाता है। वस्त्र उतार भी ले, तो भी नग्न नहीं कर सकता है। नग्न होना बड़ी घटना है वस्त्र उतरने से निर्वस्त्र होने से नग्‍न होना बहुत भिन्न‍ घटना है। निर्वस्त्र करना बहुत कठिन बात नहीं है, कोई भी कर सकता है, लेकिन नग्न करना बहुत दूसरी बात है। नग्न तो कोई स्त्री तभी होती है, जब वह किसी के प्रति खुलती है स्वयं। अन्यथा नहीं होती; वह ढंकी ही रह जाती है। उसके वस्त्र छीने जा सकते है। लेकिन वस्त्र छीनना स्त्री को नग्नं करना नहीं है।

और बात यह भी है कि द्रौपदी जैसी स्त्रीं को नहीं पा सकता दुयोर्धन। उसके व्यंग तीखे पड़ गए उसके मन पर। बड़ा हारा हुआ है। हारे हुए व्यवक्ति –जैसे कि क्रोध में आए हुई बिल्लियों खंभे नोचने लगती है। वैसा करने लगते है। और स्त्री के सामने जब भी पुरूष हारता है—और इससे बड़ी हार पुरूष को कभी नहीं होती। पुरूष से लड़ ले, हार जीत होती है। लेकिन पुरूष जब स्त्री से हारता है। किसी भी क्षण में तो इससे बड़ी हार नहीं होती है।
तो दुर्योधन उस दिन उसे नग्न करने का जितना आयोजन करके बैठा है, वह सारा आयोजन भी हारे हुए पुरूष मन का है। और उस तरफ जो स्त्री खड़ी है हंसने वाली, वह कोई साधारण स्त्री नहीं है। उसका भी अपना संकल्प है अपना विल है। उसकी भी अपनी सामर्थ्य है; उसकी भी अपनी श्रद्धा है; उसका भी अपना होना है। उसकी उस श्रद्धा में वह जो कथा है, वह कथा तो काव्य है कि कृष्ण उसकी साड़ी को बढ़ाए चले जाते है। लेकिन मतलब सिर्फ इतना है कि जिसके पास अपना संकल्प है, उसे परमात्मा का सारा संकल्पल तत्का्ल उपलब्ध् हाँ जाता है। तो अगर परमात्मा के हाथ उसे मिल जाते हे, तो कोई आश्चंर्य नहीं।

तो मैंने कहा, और मैं फिर कहता हूं, द्रौपदी नग्न की गई, लेकिन हुई नहीं। नग्न करना बहुत आसान है, उसका हो जाना बहुत और बात है। बीच में अज्ञात विधि आ गई, बीच में अज्ञात कारण आ गए। दुर्योधन ने जो चाहा, वह हुआ नहीं। कर्म का अधिकार था, फल का अधिकार नहीं था।

यह द्रौपदी बहुत अनूठी है। यह पूरा युद्ध हो गया। भीष्म पड़े है शय्या पर—बाणों की शय्या पर—और कृष्ण कहते है पांडवों को कि पूछ लो धर्म का राज, और वह द्रौपदी हंसती है। उसकी हंसी पूरे महाभारत पर छाई हे। वह हंसती है कि इनसे पूछते है धर्म का रहस्य, जब में नग्न की जा रही थी, तब ये सिर झुकाए बैठे थे। उसका व्यं‍ग गहरा है। वह स्त्री बहुत असाधारण हे।
काश, हिंदुस्ताहन की स्त्रियों ने सीता को आदर्श न बना कर द्रौपदी को आदर्श बनाया होता तो हिंदुस्तान की स्त्री की शान और होती।

लेकिन नही, द्रौपदी खो गई है। उसका कोई पता नहीं है। खो गई। एक तो पाँच पतियों की पत्नी‍ है। इसलिए मन को पीड़ा होती है। लेकिन एक पति की पत्नी होना भी कितना मुश्किकल है, उसका पता नहीं है। और जो पाँच पतियों को निभा सकती हे, वह साधारण स्त्री नहीं है। असाधारण है, सुपरह्मन हे। सीता भी अतिमानवीय है लेकिन टू ह्मन के अर्थों में। और द्रौपदी भी अतिमानवीय है, लेकिन सुपर ह्यूमन के अर्थों में।


पूरे भारत के इतिहास में द्रौपदी को सिर्फ एक आदमी न ही प्रशंसा दी है। और एक ऐसे आदमी ने जो बिलकुल अनपेक्षित है। पूरे भारत के इतिहास में डाक्टर राम मनोहर लोहिया को छोड़कर किसी आदमी ने द्रौपदी को सम्मान नहीं दिया है। हैरानी की बात है मेरा तो लोहिया से प्रेम इस बात से हो गया कि पाँच हजार साल के इतिहास में एक आदमी, जो द्रौपदी को सीता के ऊपर रखने को तैयार है।

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सबसे पहले तो यह बात जान लेनी जरूरी है कि वैज्ञानिक दृष्‍टि से सूर्य से समस्‍त सौर परिवार का—मंगल का, बृहस्‍पति का, चंद्र का, पृथ्‍वी का जन्‍म हुआ है। ये सब सुर्य के ही अंग है। फिर पृथ्‍वी पर जीवन का जन्‍म हुआ—पौधों से लेकर मनुष्‍य तक। मनुष्‍य पृथ्‍वी का अंग है, पृथ्‍वी सूरज का अंग है। अगर हम इसे ऐसा समझें—एक मां है, उसकी एक बेटी है। उन तीनों के शरीर का निर्माण एक ही तरह के सेल्‍स से एक ही तरह के कोष्‍ठों से होता है।

और वैज्ञानिक एक शब्‍द का प्रयोग करते है एम्‍पैथी का, समानुभूति का। जो चीजें एक से ही पैदा होती हे। सूर्य से पृथ्‍वी पैदा होती है, पृथ्‍वी से हम सबके शरीर निर्मित होते है। थोड़े ही दूर फासले पर सूरज हमारा महापिता है। सूर्य पर जो घटित होता है वह हमारे रोम-रोम में स्‍पंदित होता हे। क्‍योंकि हमारा रोम-रोम भी सूर्य से ही निर्मित है। सूर्य इतना दूर दिखाई पड़ता है, इतना दूर नहीं है। हमारे रक्‍त के एक-एक कण में और हड्डी की एक-एक टुकड़े में सूर्य के ही अणुओं का वास है। हम सूर्य के ही टुकड़े है। और यदि सूर्य से हम प्रभावित होते है। इसमें कुछ आश्‍चर्य नहीं है—एम्‍पैथी है, समानुभूति है।

समानुभूति को भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है। जो ज्‍योतिष के एक आयाम में प्रवेश हो सकेगा। प्रयोग किए जा सकते है। और इस तरह के बहुत से प्रयोग पिछले पचास वर्षों में किए गए है। तो एक ही अंडज जुड़वां बच्‍चों को दो कमरों में बंद कर दिया गया, फिर दोनों कमरों में एक साथ घंटी बजायी गयी है और दोनों बच्‍चों को कहा गया है, उनको जो पहला विचार जो ख्‍याल आता है वह उसे कागज पर बना लें। या तो पहला चित्र उनके दिमाग में आता हो तो उसे कागज पर बना लें।

और बड़ी हैरानी की बात है कि अगर बीस चित्र बनवाए गए है दोनों बच्‍चों से तो उसमें नब्बे प्रतिशत दोनों बच्‍चों के चित्र एक जैसे है। उनके मन में जो पहला विचारधारा पैदा होती है। जो पहला शब्‍द बनता है या जो पहला चित्र बनता है। ठीक उसके ही करीब वैसा ही विचार जुड़वां बच्‍चे के भीतर भी बनता और निर्मित होता हे।

इसे वैज्ञानिक कहते है—एम्‍पैथी, समानुभूति। इन दोनों के बीच एक समानता है कि ये एक से प्रतिध्‍वनित होते है। इन दोनों के भीतर अनजाने मार्गों से जैसे कोई जोड़ है, कोई संवाद है, कोई कम्यूनिकेशन है। सूर्य और पृथ्‍वी के बीच भी ऐसा ही कम्यूनिकेशन, ऐसा ही संवाद सेतु हे। ऐसा ही संबंध है, प्रतिपल, सूर्य, पृथ्‍वी, और मनुष्‍य उन तीनों के बीच निरंतर संवाद है, एक निरंतर डायलॉग है। लेकिन वह जो संवाद है डायलॉग है वह बहुत गुह्य है और बहुत आंतरिक है और बहुत सूक्ष्‍म है। उसके संबंध में थोड़ी सी बातें समझेंगे तो खयाल में आएगा।

अमरीका में ,एक रिसर्च सेंटर है—ट्री रिंग रिसर्च सेंटर। वृक्षों में, जो वृक्ष आप काटें तो वृक्ष के तने में आपको बहुत से रिंग्‍स, बहुत से वर्तुल दिखाई पड़ेंगे। फर्नीचर पर जो सौंदर्य मालूम पड़ता है वह उन्‍ही वर्तुलों के कारण है। पचास वर्ष से यह रिसर्च केंद्र, वृक्षों में जो वर्तुल बनते है उन पर काम कर रहा है। प्रो. डगलस अब उसके डायरेक्‍टर है, जिन्‍होंने अपने जीवन को अधिकांश हिस्‍सा, वृक्षों में जो वर्तुल बनते है। चक्र बनते है। उन पर ही पूरा व्‍यय किया है। बहुत से तथ्‍य हाथ लगे है। पहला तथ्‍य तो सभी को ज्ञात है साधारणत: कि वृक्ष की उम्र उसमें बने हुए रिंग्‍स के द्वारा जानी जा सकती है। जानी जाती है। क्‍योंकि प्रतिवर्ष एक रंग वृक्ष में निर्मित होता है। एक छाल…वृक्ष की कितनी उम्र है, उसके भीतर कितने रिंग बने हैं, इनसे तय हो जाता हे। अगर पचास साल पुराना है, उसने पचास पतझड़ देखे है तो पचास रिंग उसके तने में निर्मित हो जाते है और हैरानी की बात यह है कि इन तनों पर जो रिंग निर्मित होते है वह मौसम की भी खबर देते है।

अगर मौसम बहुत गर्म और गीला रहा हो तो जो रिंग है वह चौड़ा निर्मित होता है। अगर मौसम बहुत सर्द और सूखा रहा हो तो जो रिंग है वह बहुत सकरा निर्मित होता है। हजारों साल पुरानी लकड़ी को काटकर पता लगाया जा सकता है कि उस वर्ष जब यह रिंग बना था तो मौसम कैसा था। बहुत वर्षा हुई थी या नहीं हुई थी। सूखा पडा था या नहीं पडा था। अगर बुद्ध ने कहा है कि इस वर्ष बहुत वर्षा हुई तो जिस बोधिवृक्ष के नीचे वह बैठे थे वह भी खबर देगा कि वर्षा हुई कि नहीं हुई। बुद्ध से भूल-चूक हो जाए, वह जो वृक्ष है, बोधिवृक्ष उससे भूल चूक नहीं होती। उसका रिंग बड़ा होगा या छोटा होगा।

डगलस इन वर्तुलों की खोज करते-करते एक ऐसी जगह पहुंच गया है जिसकी उसे कल्‍पना भी नहीं थी। उसने अनुभव किया कि प्रत्‍येक ग्यारहवां वर्ष पर रिंग जितना बड़ा होता है उतना फिर कभी बड़ा नहीं होता है। और वह ग्‍यारह वर्ष वही है जब सूर्य पर सर्वाधिक गतिविधि होती है। हर ग्यारहवां वर्ष पर सूरज में एक रिद्म, एक लयबद्धता है, हर ग्‍यारह वर्ष में सूरज बहुत सक्रिय हो जाता हे। उस पर रेडियो एक्‍टिविटी बहुत तीव्र होती है। सारी पृथ्‍वी पर उस वर्ष सभी वृक्ष मोटा रिंग बनाते है। एकाध जगह नही, एकाध जगह जंगल में नहीं—सारी पृथ्‍वी पर सारे वृक्ष रेडियो एक्टिविटी से अपनी रक्षा के लिए मोटा रिंग बनाते है। वह जो सूरज पर तीव्र घटना घटती है ऊर्जा की उससे बचाव के लिए उनको मोटी चमड़ी बनानी पड़ती है, हर ग्‍यारह वर्ष में ।

इससे वैज्ञानिकों में एक नया शब्‍द और नयी बात शुरू हुई। मौसम सब जगह अलग होते है। कहीं सर्दी है, कहीं गर्मी है, कहीं वर्ष है, कहीं शीत है। सब जगह मौसम अलग है। इसलिए अब तक कभी पृथ्‍वी का मौसम क्‍लाइमेट ऑफ दी अर्थ—ऐसा कोई शब्‍द प्रयोग नहीं होता था। लेकिन अब डगलस ने इस शब्‍द का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। क्‍लाइमेट ऑफ दी अर्थ। ये सब छोटे-मोटे फर्क तो है ही लेकिन पूरी पृथ्‍वी पर भी सूरज के कारण एक विशेष मौसम चलता है। जो हम नहीं पकड़ पाते, लेकिन वृक्ष पकड़ते हे। हर ग्‍यारहवें वर्ष पर वृक्ष मोटा रिंग बनाते है, फिर रिंग छोटे होते जाते है। फिर पाँच साल के बाद बड़े होने शुरू होते हे। फिर ग्यारहवें साल पर जाकर पूरे बड़े हो जाते है।

अगर वृक्ष इतने संवेदनशील है और सूरज पर होती हुई कोई भी घटना को इतनी व्‍यवस्‍था से अंकित करते है तो क्‍या आदमी के चित में भी कोई पर्त होगी, क्‍या आदमी के शरीर में भी कोई संवेदन का सूक्ष्‍म रूप होगा, क्‍या आदमी भी कोई रिंग और वर्तुल निर्मित करता होगा अपने व्‍यक्‍तित्‍व में? अब तक साफ नहीं हो सका। अभी वैज्ञानिकों को साफ नहीं है कोई बात कि आदमी के भी क्‍या होता है। लेकिन यह असंभव मालूम होता है कि जब वृक्ष भी सूर्य पर घटती घटनाओं को संवेदित करते हों तो आदमी किसी भांति संवेदित न करता हो। ज्‍योतिष, जो जगत में कहीं भी घटित होता है वह मनुष्‍य के चित में भी घटित होता है, इसकी ही खोज है।

इस पर हम पीछे बात करेंगे कि मनुष्‍य भी वृक्षों जैसी ही खबरें अपने भीतर लिए चलता है। लेकिन उसे खोलने का ढंग उतना आसान नहीं है जितना वृक्ष को खोलने का ढंग आसान है। वृक्ष को काटकर जितनी सुविधा से हम पता लगा सकते उतनी सुविधा से आदमी को काटकर पता नहीं लगा सकते। आदमी को काटना सूक्ष्‍म मामला है और आदमी के पास चित है इसलिए आदमी का शरीर उन घटनाओं को नहीं रिकार्ड करता, चित रिकार्ड करता है। वृक्षों के पास चित नहीं है। इसलिए शरीर ही उन घटनाओं को रिकार्ड करता है।

एक और बात इस संबंध में ख्‍याल में ले लेने जैसी है—जैसा मैंने कहा, ग्‍यारह वर्ष में सूरज पर तीव्र रेडियो एक्टिविटी, तीव्र वैधुतिक तूफान चलते है—ऐसा प्रति ग्‍यारह वर्ष पर एक रिद्म, ठीक ऐसा ही एक दूसरा बड़ा रिद्म भी पता चलना शुरू हुआ है। और वह है नब्‍बे वर्ष का सूरज के ऊपर। और वह और हैरान करने वाला है।

और यह जो मैं कहा रहा हूं ये सब वैज्ञानिक तथ्‍य है। ज्‍योतिष इस संबंध में कुछ नहीं कहते है। लेकिन मैं इसलिए यह कह रहा हूं कि उनके आधार पर ज्‍योतिष को वैज्ञानिक ढंग से समझना आपके लिए आसान हो सकेगा। नब्‍बे वर्ष का एक दूसरा वर्तुल है जो कि अनुभव किया गया है। उसके अनुभव की कथा बड़ी अद्भुत है।

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मैंने सुना है कि एक गांव के बाहर एक फकीर रहता था। एक रात उसने देखा की एक काली छाया गांव में प्रवेश कर रही हे। उसने पूछा कि तुम कौन हो। उसने कहां, मैं मौत हूँ और शहर में महामारी फैलने वाली है। इसी लिये में जा रही हूं। एक हजार आदमी मरने है, बहुत काम है। मैं रूक न सकूँगी। महीने भर में शहर में दस हजार आदमी मर गये। फकीर ने सोचा हद हो गई झूठ की, मौत खुद ही झूठ बोल रही है। हम तो सोचते थे कि आदमी ही बेईमान है, ये तो देखो मौत भी बेईमान हो गई। कहां एक हजार ओर मार दिये दस हजार। मौत जब एक महीने बाद आई तो फकीर ने पूछा की तुम तो कहती थी एक हजार आदमी ही मारने है। दस हजार आदमी मर चुके और अभी मरने ही जा रहे है।
उस मौत ने कहां, मैंने तो एक हजार ही मारे है। नौ हजार तो घबराकर मर गये हे। मैं तो आज जा रही हूं, और पीछे से जो लोग मरेंगे उन से मेरा कोई संबंध नहीं होगा और देखना अभी भी शायद इतने ही मेरे जाने के बाद मर जाए। वह खुद मर रहे है। यह आत्‍महत्या है। जो आदमी भरोसा करके मर जाता है। यदि मर गया वह भी आत्‍महत्या हो गयी। ऐसी आत्‍माहत्‍याओं पर मंत्र काम कर सकते है ताबीज काम कर सकते है, राख काम कर सकती है। उसमें संत-वंत को कोई लेना-देना नहीं है। अब हमें पता चल गया है कि उसकी मानसिक तरकीबें है, तो ऐसे अंधे है।
सुना है मैंने एक घर में दो वर्ष से एक आदमी लक़वे से परेशान है—उठ नहीं सकता है, न हिल ही सकता है। सवाल ही नहीं है उठने का—सूख गया है। एक रात—आधी रात, घर में आग लग गयी हे। सारे लोग घर के बाहर पहुंच गये पर प्रमुख तो घर के भीतर ही रह गया। पर उन्‍होंने क्‍या देखा की प्रमुख तो भागे चले आ रहे है। यह तो बिलकुल चमत्‍कार हो गया। आग की बात तो भूल ही गये। देखा ये तो गजब हो गया। लकवा जिसको दो साल से लगा हुआ था। वह भागा चला आ रहा है। अरे आप चल कैसे सकते है। और वह वहीं वापस गिर गया। मैं चल ही नहीं सकता।
अभी लक़वे के मरीजों पर सैकड़ों प्रयोग किये गये। लक़वे के मरीज को हिप्नोटाइज करके, बेहोश करके चलवाया जा सकता है। और वह चलता है, तो उसका शरीर तो कोई गड़बड़ नहीं करता। बेहोशी में चलता है। और होश में नहीं चल पाता। चलता है, चाहे बेहोशी में ही क्‍यों न चलता हो एक बात का तो सबूत है कि उसके अंगों में कोई खराबी नहीं है। क्‍योंकि बेहोशी में अंग कैसे काम कर रहे है। अगर खराब हो। लेकिन होश में आकर वह गिर जाता है। तो इसका मतलब साफ है।
बहुत से बहरे है, जो झूठे बहरे है। इसका मतलब यह नहीं है कि उनको पता नहीं है क्‍योंकि अचेतन मन ने उनको बहरा बना दिया है। बेहोशी में सुनते है। होश में बहरे हो जाते है। ये सब बीमारियाँ ठीक हो सकती है। लेकिन इसमें चमत्कार कुछ भी नहीं है। चमत्‍कार नहीं है, विज्ञान जो भीतर काम कर रहा है। साइकोलाजी, वह भी पूरी तरह स्‍पष्‍ट नहीं है। आज नहीं कल, पूरी तरह स्‍पष्‍ट हो जायेगा।
आप एक साधु के पास गये। उसने आपको देखकर कह दिया, आपका फलां नाम है? आप फलां गांव से आ रहे है। बस आप चमत्‍कृत हो गये। हद हो गयी। कैसे पता चला मेरा गांव, मेरा नाम, मेरा घर? क्‍योंकि टेलीपैथी अभी अविकसित विज्ञान है। बुनियादी सुत्र प्रगट हो चुके है। अभी दूसरे के मन के विचार को पढ़ने कि साइंस धीरे-धीरे विकसित हो रही है। और साफ हुई जा रही है। उसका सबूत है, कुछ लेना देना नहीं है। कोई भी पढ़ सकेगा, कल जब साइंस हो जायेगी, कोई भी पढ़ सकेगा। अभी भी काम हुआ है। और दूसरे के विचार को पढ़ने में बड़ी आसानी हो गयी हे। छोटी सी तरकीब आपको बता दूँ, आप भी पढ़ सकते है। एक दो चार दिन प्रयोग करें। तो आपको पता चल जायेगा, और आप पढ सकते है। लेकिन जब आप खेल देखेंगे तो आप समझेंगे की भारी चमत्‍कार हो रहा है।
एक छोटे बच्‍चे को लेकर बैठ जायें। रात अँधेरा कर लें। कमरे में। उसको दूर कोने में बैठा लें। आप यहां बैठ जायें और उस बच्‍चे से कह दे कि हमारी तरफ ध्‍यान रख। और सुनने की कोशिश कर, हम कुछ ने कुछ कहने की कोशिश कर रहे है। और अपने मन में एक ही शब्‍द ले लें और उसको जोर से दोहरायें। अंदर ही दोहरायें, गुलाब, गुलाब, को जोर से दोहरायें, गुलाब, गुलाब, गुलाब.......दोहरायें आवाज में नहीं मन में जोर से। आप देखेंगे की तीन दिन में बच्‍चे ने पकड़ना शुरू कर दिया। वह वहां से कहेगा। क्‍या आप गुलाब कह रहे है। तब आपको पता चलेगा की बात क्‍या हो गयी।
जब आप भीतर जोर से गुलाब दोहराते है। तो दूसरे तक उसकी विचार तरंगें पहुंचनी शुरू हो जाती है। बस वह जरा सा रिसेप्‍टिव होने की कला सीखने की बात है। बच्‍चे रिसेप्‍टिव है। फिर इससे उलट भी किया जा सकता है। बच्‍चे को कहे कि वह एक शब्‍द मन में दोहरायें और आप उसे तरफ ध्‍यान रखकर, बैठकर पकड़ने की कोशिश करेंगें। बच्‍चा तीन दिन में पकड़ा है तो आप छह दिन में पकड़ सकते है। कि वह क्‍या दोहरा रहा है। और जब एक शब्‍द पकड़ा जा सकता है। तो फिर कुछ भी पकड़ा जा सकता है।
हर आदमी के अंदर विचार कि तरंगें मौजूद है, वह पकड़ी जा रही है। लेकिन इसका विज्ञान अभी बहुत साफ न होने की वजह से कुछ मदारी इसका उपयोग कर रह है। जिनको यह तरकीब पता है वह कुछ उपयोग कर रहे है। फिर वह आपको दिक्‍कत में डाल देते है।
यह सारी की सारी बातों में कोई चमत्‍कार नहीं है। न चमत्‍कार कभी पृथ्‍वी पर हुआ नहीं। न कभी होगा।

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एक हजार साल गुलाम रहे थे, और यहां ऐसे चमत्‍कारी पड़े है कि जिसका कोई हिसाब नहीं, गुलामी की जंजीरें नहीं कटतीं। ऐसा लगता है कि अंग्रेजो के सामने चमत्‍कार नहीं चलता। चमत्‍कार होने के लिए हिंदुस्‍तानी होना जरूरी है। क्‍योंकि अगर खोपड़ी में थोड़ी भी विचार चलता हो, तो चमत्‍कार के कटने का डर रहता है। तो जहां विचार है, बिलकुल न चला पाओगे चमत्‍कार को। सब से बड़ा चमत्‍कार यह है कि लोग चमत्‍कार कर रहे है। सबसे बड़ा चमत्‍कार यह है कि हम खुद भी होते हुए चमत्‍कार देख रहे हे। और घरों में बैठकर चर्चा कर रहे है। कि चमत्‍कार हो रहा है। और कोई इन चमत्‍कारियों की जाकर गर्दन नहीं पकड़ लेता कि जो खो गयी है घड़ी उसको बाहर निकलवा ले, कि क्‍या मामला है। क्‍या कर रहे हो? वह नहीं होता है।
हम हाथ पैर जोड़कर खड़े है..... उसका कारण है, हमारे भीतर कमजोरीया है। जब राख की पुड़िया निकलती है तो हम सोचते है कि भई, शायद और भी कुछ निकल आयें, पीछे, राख की पुड़िया से कुछ होनेवाला नहीं है न, आगे कुछ और संभावना बनती है। आशा बंधती है। और कोई बीमार है, किसी को नौकरी नहीं मिली है, किसी की पत्‍नी मर गई है, किसी का किसी से प्रेम है, किसी का मुकदमा चल रहा है, सबकी तकलीफें है। तो लगता है जो आदमी ऐसा कर रहा है, अपनी तकलीफ भी कुछ कम कर रहा है। दौड़ो इसके पीछे।
बीमारी, गरीबी, परेशानी, उलझनें कारण हैं कि हम चमत्‍कारियों के पीछे भाग रहे है। कोई धार्मिक जिज्ञासा कारण है, धार्मिक जिज्ञासा से इसका कोई संबंध नहीं है। धार्मिक जिज्ञासा से इसका क्‍या वास्‍ता। धार्मिक जिज्ञासा का क्‍या हल होगा, इन सारी बातों से, लेकिन लोग करते चले जाएंगे, क्‍योंकि हम गहरे अज्ञान में है, गहरे विश्‍वास में है। लोग कहते चले जाएंगे और शोषण होता चला जायेगा। पुराने चित ने चमत्‍कारी पैदा किया था। लेकिन जिन-जिन कौमों ने चमत्‍कारी पैदा किये उन-उन कौमों ने विज्ञान पैदा नहीं किया।
ध्‍यान रहे, चमत्‍कारी चित वहीं पैदा हो सकता है जहां एंटी सांइटिफिक माइंड हो, जहां विज्ञान विरोधी चित हो। जहां विज्ञान आयेगा वहां चमत्‍कारी मरेगा। क्‍योंकि विज्ञान कहेगा, चमत्‍कार को कि हम काज़ और इफेक्‍ट में मानते है। हम मानते है, कार्य और कारण में। विज्ञान किसी चमत्‍कार को नहीं मानता है। उसने हजारों चमत्‍कार किये है। जिनमें से एक भी कोई संत कर देता तो हम हजारों-लाखों साल तक उसकी पूजा करते। अब यह पंखा चल रहा है, यह माइक आवाज कर रहा है। यह चमत्‍कार नहीं होगा। क्‍योंकि यह विज्ञान ने किया है। और विज्ञान किसी चीज को छिपाता नहीं है। सारे कार्य-कारण प्रगट कर देता है। आदमी का ह्रदय बदला जा रहा है। दूसरे का ह्रदय उसके काम कर रहा है। आदमी के सारे शरीर के पार्ट बदले जा रहे है।
आज नहीं कल, हम आदमी की स्‍मृति भी बदल सकेंगे। उसकी भी संभावना बढ़ती जा रही है। कोई जरूरी नहीं है कि एक आइंस्‍टीन माइ्ंड वह मर ही जाये। आइंस्‍टीन मरे—मरे, उसकी स्‍मृति को बचाकर हम एक नये बच्‍चे में ट्रांस्‍पलांट कर सकते है। इतने बड़े चमत्‍कार घटित हो रहे है। लेकिन कोई नासमझ न कहेगा कि ये चमत्‍कार है। कहेगा, ऐसा चमत्‍कार क्‍या है। और कोई आदमी की फोटो में से राख झाड़ देता है, हम हाथ जोड़कर खडे हो जाते है चमत्‍कार हो रहा है, बड़ा आश्‍चर्य है। अवैज्ञानिक विज्ञान विरोधी चित है। विज्ञान ने इतने चमत्‍कार घटित किये है कि हमें पता ही नहीं चलता, क्‍योंकि विज्ञान चमत्‍कार का दावा नहीं करता। विज्ञान खुला सत्‍य है, ओपन सीक्रेट है।
और यह जो बेईमानों की दुनिया है यहां..... इसलिए अगर किसी आदमी को कोई तरकीब पता चल जाती है। तो उसको खोलकर नहीं रख सकता। क्‍योंकि खोले तो चमत्‍कार गया। इसलिए ऐसे मुल्‍क का ज्ञान रोज बढ़ जाता है। अगर मुझे कोई चीज पता चल जाये और चमत्‍कार करना हो तो पहली जरूरत हो यह है कि उसके पीछे जो राज है, उसको मैं प्रगट न करूं। आयुर्वेद ने बहुत विकास किया, लेकिन आयुर्वेद का जो वैद्य था, वह वह चमत्‍कार कर रहा था। इसलिए आयुर्वेद पिछड़ गया। नहीं तो आयुर्वेद की आज की स्‍थिति एलोपैथी से कहीं बहुत आगे होती। क्‍योंकि ऐलापैथी की खोज बहुत नयी हे। आयुर्वेद की खोज बहुत पुरानी है। इसलिए एक वैद्य को जो पता है, वह अपने बेटे को भी न बातयेगा, नहीं तो चमत्‍कार गड़बड़ हो जायेगा। मजा लेना चाहता है।
मजा लेना चाहता है—टीका, छाप लगाकर और साफ़ा वगैरह बांधकर बैठा रहेगा और मर जायेगा। वह जो जान लिया था। वह छिपा जायेगा। क्‍योंकि वह अगर पूरी कड़ी बता दे, तो फिर चमत्‍कार नहीं होगा। लेकिन तब साइंस बंद करनी पड़ी। हिंदुस्‍तान में कोई साइंस नही बनती। जिस आदमी को जो पता है, वह उसको छिपाकर रखता है। वह कभी उसका पता किसी को चलने नहीं देगा। क्‍योंकि पता चला कि चमत्‍कार खत्‍म हो गया। इस वजह से हमारे मुल्‍क में ज्ञान की बहुत दफे किरणें प्रगट हुई। लेकिन ज्ञान का सूरज कभी न बन पाया। क्‍योंकि एक-एक किरण मर गयी। और उसे कभी हम बपौती न बना पाये कि उसे हम आगे दे सकें। उसको देने में डर है, क्‍योंकि दिया तो कम से कम उसे तो पता ही चल जायेगा कि अरे....।
एक महिला मेरे पास प्रोफसर थी— वह संस्‍कृत की प्रोफेसर थी। वह इसी तरह एक मदारी के चक्‍कर में आ गयी। जिनकी फोटो से राख गिरती है। और ताबीज निकलते है। उसने मुझ से आकर आशीर्वाद मांगा कि मैं अब जा रही हूं। सब छोड़कर। मुझे तो भगवान मिल गये है। अब कहां यहां पड़ी रहूंगी। आप मुझे आशीर्वाद दें। मैंने कहा, यह आशीर्वाद मांगना ऐसा है, जैसे कोई आये कि अब मैं जा रहा हूं कुएं में गिरने को और उसको मैं आशीर्वाद दूं। मैं न दूंगा। तुम कुएं में गिरो मजे से, लेकिन इसमें ध्‍यान रखना कि मैंने आशीर्वाद नही दिया। क्‍योंकि मैं इस पाप में क्‍यों भागीदार होऊं। मरो तुम, फंसू मैं। यह मैं न करूंगा। तुम जाओ मजे से गिरो। लेकिन जिस दिन तुम्‍हें पता चल जाये कि कुएं में गिर गई हो और अगर बच सकी हो, तो मुझे खबर जरूर कर देना।
पाँच-सात साल बीत गए, मुझे याद भी नहीं रहा, उस महिला का क्‍या हुआ। क्‍या नहीं हुआ। पिछले वक्‍त बंबई में बोल रहा था सभा में, तो वह उठकर आयी और उसने मुझे आकर कहा, आपने जो कहा, वह घटना हो गयी है। तो मैं कब आकर पूरी बात बजा जाऊं। लेकिन कृपा करके किसी और को मत बताना। मैंने कहां, क्‍यों? उसने कहा वह भी मैं कल बजाऊंगी। वह कल आयी उसने कहा, अब बड़ी मुश्‍किल हो गयी। जिन ताबीजों को आकाश से निकालते देखकर मैं प्रभावित हुई थी। अब मैं उन्‍हीं संत की प्राइवेट सेकेट्री हो गई हूं। अब मैं उन्‍हीं के ताबीज बाजार से खरीद कर लाती हूं। बिस्‍तर के नीचे छिपा आती हूं। प्रगट होने का सब राज पता हो गया है। अब मैं भी प्रगट कर सकती हूं। लेकिन बड़ी मुशिकल में पड़ गयी हूं। उसी चमत्‍कार से तो हम आये भी। अब वह चमत्‍कार सब खत्‍म हो गया है। अब मैं क्‍या करूं? अब मैं छोड़कर आ जाऊं, तो उसमें तो और भी मुश्‍किल है।
कालेज में नौकरी करती थी, मुझे सात सौ रूपये मिलते थे। अब मुझे कोई दो-ढाई हजार रूपये को फायदा, महीने का होगा। और इतने रूपये आते है मेरे पास कि जितने उसमें से उड़ा दूं, वह अलग है। उसका कोई हिसाब नहीं है। इसलिए मैं आ तो नहीं सकती। इसलिए में आपको कहती हूं कृपा करके किसी और को मत कह देना। अब मेरी काम अच्‍छा चल रहा है। नौकरी है, लेकिन अब तो चमत्‍कार वह अध्‍यात्‍म का कोई लेना देना नहीं है।
तो इसलिए पता न चल जाये—वह सारा त्‍याग चल रहा है। ज्ञान पता है— पगट होने को उत्‍सुक होता है। बेइ्रमानी सदा अप्रकट रहना चाहती है। ज्ञान सदा खुलता है, बेईमानी सदा छिपाती है। नहीं, कोई मिरेकल जैसी चीज दुनिया में नहीं होती, न हो सकती है। और अगर होती होगी, तो पीछे जरूर कारण होगा। यह हो सकता है। और अगर होती होगी। तो पीछे जरूर करण होगा। यह हो सकता है। आज कारण न खोजा जा सके, कल खोज लिया जायेगा, परसों खोज लिया जायेगा।

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चमत्‍कार शब्‍द का हम प्रयोग करते है, तो साधु-संतों का खयाल आता है। एक जो ठीक ढंग से मदारी हैं, आनेस्‍ट वे सड़क के चौराहों पर चमत्‍कार दिखाते है। दूसरे: ऐसे मदारी है, डिस्‍आनेस्‍ट, बेईमान, वे साधु-संतों के वेश में, वे ही चमत्‍कार दिखलाते है। जो चौरस्‍तों पर दिखाई जाते है। बेईमान मदारी सिनर है, अपराधी है, क्‍योंकि मदारीपन के अधार पर वह कुछ और मांग कर रहा है।

अभी मैं कुछ वर्ष पहले एक गांव में था। एक बूढ़ा आदमी आया। मित्र लेकर आये थे और कहा कि आपको कुछ काम दिखलाना चाहते है। मैंने कहा, दिखायें। उस बढ़े ने अद्भुत काम दिखलाये। रूपये को मेरे सामने फेंका वह दो फिट ऊपर जाकर हवा में विलीन हो गया। मैंने उस बूढे आदमी से कहा, बड़ा चमत्‍कार करते है आप। उसने कहा, नहीं यह कोई चमत्‍कार नहीं है। सिर्फ हाथ की तरकीब है। मैंने कहा, तुम पागल हो। सत्‍य साई बाबा हो सकते थे। क्‍या कर रहे हो। क्‍यों इतनी सच्‍ची बात बोलते हो? इतनी ईमानदारी उचित नहीं है। लाखों लोग तुम्‍हारे दर्शन करते। तुम्‍हें मुझे दिखाने ने आना होता, मैं ही तुम्‍हारे दर्शन करता।
वह बह बूढ़ा आदमी हंसने लगा। कहने लगा, चमत्‍कार कुछ भी नहीं है। सिर्फ हाथ की तरकीब है। उसने सामने ही — कोई मुझे मिठाई भेंट कर गया था— एक लडडू उठाकर मुंह में डाला, चबाया, पानी पी लिया। फिर उसने कहा कि नहीं, पसंद नहीं आया। फिर उसे पेट जो से खींचा पकड़कर लडडू को वापिस निकालकर सामने रख दिया। मैंने कहा, अब तो पक्‍का ही चमत्‍कार है। उसने कहा कि नहीं। अब दुबारा आप कहिये, तो मैं न दिखा सकूंगा, क्‍योंकि लडडू छिपाकर आया अरे वह लडडू पहले मैंने ही भेट भिजवाये था। इसके पहले जो दे गया है, अपना ही आदमी है।
मगर वह ईमानदार आदमी है। एक अच्‍छा आदमी है। यह मदारी समझा जायेगा। इसे कोई संत समझता तो कोई बुरा न था, कम से कम सच्‍चा तो था। लेकिन मदारियों के दिमाग है, और वह कर रहे है यही काम। कोई राख की पुड़िया निकाल रहा है। कोई ताबीज निकाल रहा है। कोई स्‍विस मेड घड़ियाँ निकाल रहा है। और छोटे—साधारण नहीं—जिनको हम साधारण नहीं कहते है, गवर्नर, वाइस चाइन्‍सलर है, हाईकोर्ट के जजेस है, वह भी मदारियों के आगे हाथ जोड़े खड़े है। हमारे गर्वनर भी ग्रामीण से ऊपर नहीं उठ सके है। उनकी बुद्धि भी साधारण ग्रामीण आदमी से ज्‍यादा नहीं। फर्क इतना है कि ग्रामीण आदमी के पास सर्टिफिकेट नहीं है। उसके पास सर्टिफिकेट है।
चमत्‍कार—इस जगत में चमत्‍कार जैसी चीज सब में होती नहीं, हो नहीं सकती। इस जगत में जो कुछ होता है, नियम से होता है। हां, यह हो सकता है, नियम का हमें पता न हो। यह हो सकता है कि कार्य, कारण को हमें बोध न हो। यह हो सकता है कि कोई लिंक, कोई लिंक, कोई अज्ञात हो, जो हमारी पकड़ में नहीं आती, इसलिए बाद की कड़ियों को समझना बहुत मुश्‍किल हो जाता है।
बाकू में—उन्‍नीस सौ सत्रह के पहले, जब रूस में क्रांति हुई थी—उन्‍नीस सौ सत्रह के पहले, बाकू में एक मंदिर था। उस मंदिर के पास प्रति वर्ष एक मेला लगता था। वह दुनिया का सबसे बड़ा मेला था। कोई दो करोड़ आदमी वहां इकट्ठा होते थे। और बहुत चमत्‍कार की जगह थी वह, अपने आप अग्‍नि उत्‍पन्‍न होती थी। वेदी पर अग्‍नि की लपटें प्रगट हो जाती थीं। लाखों लोग खड़े होकर देखते थे। कोई धोखा न था। कोई जीवन न था, कोई आग जलाता न था। कोई वेदी पास आता न था। वेदी पर अपने आप अग्‍नि प्रगट होती थी। चमत्‍कार भारी था। सैकड़ों वर्षो से पूजा होती थी। भगवान प्रगट होते, अग्‍नि के रूप में अपने आप।
फिर उन्‍नीस सौ सत्रह में रक्‍त क्रांति हो गयी। जो लोग आये, वह विश्‍वासी न थे, उन्‍होंने मड़िया उखाड़कर फेंक दी और गड्ढे खोदे। पता चला, वहां तेल के गहरे कुंए है—मिट्टी के तेल, मगर फिर भी यह बात तो साफ हो गयी कि मिट्टी के तेल के घर्षण से भी आग पैदा होती है। लेकिन खास दिन ही होती थी। जब तो खोज-बीन करन पड़ी तो पता चला कि जब पृथ्‍वी एक विशेष कोण पर होती है। अपने झुकाव के, तभी नीचे के तेल में घर्षण हो जाती है। इसलिए निश्‍चित दिन पर प्रतिवर्ष वह आग पैदा हो जाती थी। जब यह बात साफ़ हो गयी। तब वहां मेला लगना बंद हो गया। अब भी वहां आग पैदा होती है। लेकिन अब कोई इकट्टा नहीं होता है। क्‍योंकि कार्य कारण पता चल गया है। बात साफ़ हो गयी है। अग्‍नि देवता अब भी प्रकट होते है, लेकिन वह केरोसिन देवता होते है। अब वह अग्‍नि देवता नहीं रह गये। चमत्‍कार जैसी कोई चीज नहीं होती। चमत्‍कार का मतलब सिर्फ इतना ही होती है कि कुछ है जो अज्ञात है, कुछ है जो छिपा है, कोई कड़ी साफ़ नहीं है वह हो रहा है।
एक पत्‍थर होता है अफ्रीका में, जो पानी को भाप को पी जाता है, पारस होता है। थोड़े से उसमें छेद होते है। वह भाप को पी लेते है। तो वर्षा में वह भाप को पी जाता है, लेकिन वह स्‍पंजी है। उसकी मूर्ति बन जाती है। वह मूर्ति जब गर्मी पड़ती है, जैसे सूरज से अभी पड़ रही है, उसमें से पसीना आने लगता है। उस तरह के पत्‍थर और भी दुनियां में पाये जाते है। पंजाब में एक मूर्ति है, वह उसी पत्‍थर की बनी हुई है। जब गर्मी होती है। तो भक्‍त गण पंखा झलते है, उस मूर्ति को की भगवान को पसीना आ रहा है। और बड़ी भीड़ इकट्ठी होती है। क्‍योंकि बड़ा चमत्‍कार है—पत्‍थर की मूर्ति को पसीना आये।
तो जब मैं उस गांव में ठहरा था तो एक सज्‍जन ने मुझे आकर कहा कि आप मजाक उड़ाते है। आप सामने देख लीजिए चलकर भगवान को पसीना आता है। और आप मजाक उड़ाते है। आप कहते है, भगवान को सुबह-सुबह दातुन न क्‍यों रखते हो, पागल हो गये हो, पत्‍थर को दातुन रखते हो। कहते हो, भगवान सोयेंगे, अब भोजन करेंगे। जब उनको पसीना आ रहा है। तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो सकती है। वह ठीक कह रहा है। उसे कुछ पता नहीं है उसमें से पसीना निकलता है। जिस ढंग से आप में पसीना बह रहा है। उसी ढंग से उसमें भी बहने लगता है। आप में भी पसीना कोई चमत्‍कार नहीं है। आपका शरीर पारस है तो वह पानी पी जाता है। और जब गर्मी होती है। तो शरीर की अपनी एअरकंडीसिनिंग की व्‍यवस्‍था है। वह पानी को छोड़ देता है, ताकि भाप बनकर उड़े, और शरीर को ज्‍यादा गर्मी न लगे। वह पत्‍थर भी पानी पी गया है। लेकिन जब तक हमें पता नहीं है। तब तक बड़ा मुश्‍किल होता है। फिर इस संबंध में जिस वजह से उन्‍होंने पूछा होगा, वह मेरे ख्‍याल में है। दो बातें और समझ लेनी चाहिए।
एक तो यह कि चमत्‍कार संत तो कभी नहीं करेगा। नहीं करेगा, क्‍योंकि कोई संत आपके अज्ञान को न बढ़ाना चाहेगा। और कोई संत आपके अज्ञान का शोषण नहीं करना चाहेगा। संत आपके अज्ञान को तोड़ना चाहता है। बढ़ाना नहीं चाहता है। और चमत्‍कार दिखाने से होगा क्‍या? और बड़े मजे की बात है, क्‍योंकि पूछते है कि जो लोग राख से पुड़िया निकालते है, आकाश से ताबीज गिराते है..... काहे को मेहनत कर रहे हैं, राख की पुड़िया से किसका पेट भरेगा। ऐटमिक भट्ठियाँ आकाश से उतारों, कुछ काम होगा। जमीन पर उतारों, गेहूँ उतारों— गेहूँ के लिए अमरीका के हाथ जोड़ों, और असली चमत्‍कार हमारे यहां हो रहे है। तो गेहूँ क्‍यों नहीं उतार लेते हो। राख की पुड़िया से क्‍या होगा, गेहूँ बरसाओ।
जब चमत्‍कार ही कर रहे हो। तो कुछ ऐसा चमत्‍कार करो कि मुल्‍क को कुछ हित हो सके। सबके ज्‍यादा गरीब मुल्‍क, जमीन पर उतारों गेहूँ उतारों घन, सोना, चांदी, होने दो हीरे मोतियों कि बारिश, मिट्टी से बनाओ सोना। चमत्‍कार ही करने है तो कुछ ऐसे करो। स्‍विस मेड घडी चमत्‍कार से निकालते हो। तो क्‍या फायदा होगा। कम से कम मेड इन इंडिया भी निकालों तो क्‍या होने वाला है। मदारी गिरी से होगा क्‍या? कभी हम सोचें कि हम इस पागलपन में किस भ्रांति में भटकते है।
पिछले दो ढाई हजार वर्षो से, इन्‍हीं पागलों के चक्‍कर में लगे हुए है। और हम कैसे लोग है कि हम यह नहीं पूछते कि माना कि आपने राख की पुड़िया निकाल ली, अब क्‍या मतलब है, होना क्‍या है? चमत्‍कार किया, बिलकुल चमत्‍कार किया, लेकिन राख की पुड़िया से होना क्‍या है? कुछ और निकालों, कुछ काम की बात निकाल लो। वह कुछ नहीं, नहीं वह मुल्‍क दीन क्‍यों है, यहां तो एक चमत्‍कारी संत पैदा हो जाये तो सब ठीक हो जाए।

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