" मेरा पूरा प्रयास एक नयी शुरुआत करने का है। इस से विश्व- भर में मेरी आलोचना निश्चित है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता "

"ओशो ने अपने देश व पूरे विश्व को वह अंतर्दॄष्टि दी है जिस पर सबको गर्व होना चाहिए।"....... भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, श्री चंद्रशेखर

"ओशो जैसे जागृत पुरुष समय से पहले आ जाते हैं। यह शुभ है कि युवा वर्ग में उनका साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है।" ...... के.आर. नारायणन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति,

"ओशो एक जागृत पुरुष हैं जो विकासशील चेतना के मुश्किल दौर में उबरने के लिये मानवता कि हर संभव सहायता कर रहे हैं।"...... दलाई लामा

"वे इस सदी के अत्यंत अनूठे और प्रबुद्ध आध्यात्मिकतावादी पुरुष हैं। उनकी व्याख्याएं बौद्ध-धर्म के सत्य का सार-सूत्र हैं।" ....... काज़ूयोशी कीनो, जापान में बौद्ध धर्म के आचार्य

"आज से कुछ ही वर्षों के भीतर ओशो का संदेश विश्वभर में सुनाई देगा। वे भारत में जन्में सर्वाधिक मौलिक विचारक हैं" ..... खुशवंत सिंह, लेखक और इतिहासकार


दूसरे की किसी बात को लेकर सोचें मत। "और तुम यही सोचते रहते हो। निन्यानबे प्रतिशत बातें जो तुम सोचते हो उनका लेना-देना दूसरों से रहता है। छोड़ दें, उन्हें इसी वक्त छोड़ दें! "तुम्हारा जीवन बहुत छोटा है, और जीवन हाथों से फिसला जा रहा है। हर घड़ी तुम कम हो रहे हो, हर दिन तुम कम हो रहे हो, और हर दिन तुम कम जीवित होते जाते हो! हर जन्म-दिन तुम्हारा मरण-दिन है; तुम्हारे हाथों से एक वर्ष और फिसल गया। कुछ और प्रज्ञावान बनो।

"जिस बात का लेना-देना दूसरों से है, उसके बारे में मत सोचें। पहले अपनी मुख्य दुर्बलता के विपरीत अभ्यास करें।

"गुरजिएफ अपने अनुयायियों से कहा करता था-- 'पहली बात, सबसे पहली बात, ढूंढें कि तुम्हारी मूल दुर्बलता क्या है, तुम्हारा मुख्य अकर्म, तुम्हारे अवचेतन की केंद्रीय संकीर्णता क्या है। 'हर व्यक्ति अलग है। कोई व्यक्ति काम से ग्रसित है। भारत जैसे देश में, जहां काम को सदियों दबाया जाता रहा है, यह लगभग वहां एक मनोग्रस्ति बन गया है; हर व्यक्ति काम से ग्रसित है। कोई क्रोध से ग्रसित है, और कोई लोभ से ग्रसित है। तुम्हें देखना होगा कि तुम्हारी मूल मनोग्रस्ति क्या है। "अत: सबसे पहले अपनी मूल मनोग्रस्ति को जानें जिसके ऊपर तुम्हारे पूरे अहंकार का भवन खड़ा है। और फिर निरंतर सचेत रहें क्योंकि यह केवल तभी रह सकती है अगर तुम अचेत हो। बोध की अग्नि में जल कर यह स्वयं ही भस्म हो जाती है। "और स्मरण रहे, सदा स्मरण रहे कि तुम्हें इसके विपरीत को पोषित नहीं करना है। नहीं तो होता यह है कि व्यक्ति को यह बोध होने लगता है कि 'मैं क्रोध में ग्रसित हो जाता हूं तो मुझे करुणा को पोषित करना चाहिए।' 'मैं काम मे आविष्ट हो जाता हूं, मुझे क्या करना चाहिए? मुझे ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना चाहिए।' "लोग एक अति से दूसरी अति पर जाने लगते हैं। यह अतिक्रमण का ढंग नहीं है। यह वही पेंडुलम है, बाएं से दाएं जाता हुआ और दाएं से बाएं। ठीक इसी तरह तुम्हारा जीवन सदियों से चल रहा है; यह वही पेंड़ुलम है। "पेंडुलम मध्य में रोकना होगा। और यही बोध का करिश्मा है। बस यह बोध रखें, 'यही मेरी मुख्य खाई है, यही वह स्थान है जहां मैं बार-बार टकराता हूं, यही मेरी बेहोशी की जड़ है।' "दूसरी अति को पोषित करें, बस, अपनी पूरी चेतना वहीं उड़ेल दें। अपने समस्त बोध की होलिका बनाएं, और बेहोशी उसमें जल कर भस्म हो जाएगी। और तब पेंडुलम बीच में रुक जाएगा। "और पेंडुलम के रुकने से समय रुक जाता है। तुम समयातीत, सनातन शाश्वत में प्रवेश कर जाते हो।

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हर व्यक्ति प्रेम चाहता है और यही गलत शुरुआत है

यह शारीरिक नहीं है; इसका नाता कहीं विश्रांति से है, पिघलने से है, पूरा मिट जाने से है। उन पलों में यह मिट जाता है अत: निश्चित ही यह शारीरिक नहीं। तुम्हें अधिक प्रेम देना सीखना होगा। यह केवल तुम्हारी समस्या नहीं है; थोड़ी या ज़्यादा, यह समस्या सभी की है।

एक बच्चा, एक छोटा बच्चा प्रेम नहीं कर सकता, कुछ कह नहीं सकता, कुछ कर नहीं सकता, कुछ दे नहीं सकता; बस ले सकता है। छोटे बच्चे का प्रेम का अनुभव केवल लेने का है: मां से, पिता से, बहनों से, भाइयों से, पड़ोसियों से, अजनबियों से-- बस लेने का अनुभव। तो पहला अनुभव जो उसके अचेतन तक पैठ जाता है वह प्रेम लेने का है। परंतु समस्या यह है कि हर व्यक्ति बच्चा रहा है और हर व्यक्ति के भीतर प्रेम पाने की आकांक्षा है; कोई भी किसी अलग ढंग से पैदा नहीं हुआ है। तो सभी मांग रहे हैं,"हमें प्रेम दो" लेकिन देने वाला कोई भी नहीं क्योंकि वे भी उसी तरह पैदा हुए हैं। हमें सजग व सचेत रहना चाहिए कि हम जन्म की यह अवस्था हमारे पूरे जीवन पर आच्छादित न हो जाए।

बजाये इसके कि तुम कहो कि"मुझे प्रेम दो", तुम प्रेम देना शुरु कर दो। मांगने की बात ही भूल जाओ। बस प्रेम बांटो। और मैं भरोसा दिलाता हूं कि तुम्हें और अधिक प्रेम मिलेगा।

परंतु तुम्हें लेने के बारे में सोचना ही नहीं है, कनखियों से भी नहीं देखना है कि तुम्हें प्रेम मिल रहा है या नहीं। वह भी खलल होगा। तुम केवल प्रेम दो, क्योंकि प्रेम देना बहुत सुंदर बात है और प्रेम मांगना इतनी बढ़िया बात नहीं है। यह एक बड़ा रहस्य है।

प्रेम देना बहुत सुंदर अनुभव है क्योंकि देने में तुम सम्राट हो जाते हो। लेना बहुत तुच्छ अनुभव है क्योंकि तुम भिखारी हो जाते हो। जहां तक प्रेम का प्रश्न है, भिखारी मत बनो, सम्राट रहो क्योंकि तुम्हारे भीतर यह गुणवत्ता असीम है। तुम जितना देना चाहो, दिए चले जा सकते हो। तुम यह चिंता मत करना कि यह चुक जाएगा, कि एक दिन तुम पाओगे कि "हे प्रभु, मेरे पास तो प्रेम देने के लिए बचा ही नहीं।"

प्रेम मात्रा नहीं, गुणवत्ता है, ऐसी गुणवत्ता-- जो देने से बढ़ती है और पकड़े रहने से मर जाती है। अत: इसे पूरी तरह लुटा दो। चिंता मत लो, किसे-- यह कंजूस व्यक्ति सोचता है: मैं उसे प्रेम दूंगा जिसमें अमुक गुण होंगे। तुम्हें पता ही नहीं कि तुम्हारे पास कितना प्रेम है… तुम भरे हुए बादल हो।

बादल यह चिंता नहीं लेता कि कहां बरसे। चट्टान हो कि उपवन या कि सागर-- कोई परवाह नहीं। यह स्वयं को हल्का करना चाहता है और वह निर्भारता ही विश्रांति है।
तो पहला रहस्य है: इसे मांगें मत, प्रतीक्षा मत करें कि कोई आएगा तो हम देंगे। बस दे दें।

अपना प्रेम किसी को भी दें-- किसी अजनबी को ही सही। प्रश्न यह नहीं है कि तुम कुछ बहुत कीमती दे रहे हो, कुछ भी, थोड़ी सी सहायता, और वह काफ़ी है। चौबीस घंटों में तुम जो भी करते हो उसे प्रेम से करो और तुम्हारे दिल की पीड़ा मिट जाएगी।

और क्योंकि तुम इतने प्रेमपूर्ण होओगे, लोग तुम्हें प्रेम करेंगे। यह स्वाभाविक नियम है।

तुम्हें वही मिलता है जो तुम देते हो। वास्तव में तुम उससे अधिक पाते हो जो तुम देते हो। देना सीखो और तुम पाओगे कि लोग तुम्हारे प्रति कितने प्रेमपूर्ण हैं-- वही लोग जिन्होंने तुम्हारे प्रति कभी ध्यान नहीं दिया। तुम्हारी समस्या यही है कि तुम्हारा दिल प्रेम से भरा है लेकिन तुम कंजूस रहे हो; वही प्रेम तुम्हारे दिल पर बोझ हो गया है। दिल को खुला रखने की बजाए तुम इसे पकड़े रहे तो कभी-कभार, किसी प्रेम की घड़ी में यह पीड़ा तिरोहित होने लगती है। पर एक घड़ी क्यों, एक-एक घड़ी क्यों नहीं?

यह केवल किसी जीते-जागते व्यक्ति की बात ही नहीं, तुम किसी कुर्सी को भी उतने प्रेमपूर्ण ढंग से छू सकते हो। इसका संबंध तुमसे है, वस्तु से नहीं।

तब तुम्हें गहन विश्रांति का अनुभव होगा और तुम्हारा एक अंश मिटने लगेगा-- जो बोझ है-- और तुम समग्र में पिघलने लगोगे। यह वास्तव में रोग है: सही अर्थों में डिस-ईज़--बोझ। यह रोग नहीं अत: कोई चिकित्सक तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता। यह मात्र तुम्हारे दिल के तनाव की अवस्था है जो अधिक से अधिक बांटना चाहता है। शायद तुम्हारे पास दूसरों से अधिक प्रेम है, शायद तुम उनसे अधिक भाग्यशाली हो और शायद तुम अपने भाग्य में स्वयं ही दुख पैदा कर रहे हो। यह प्रेम किसे दूं-- इस चिंता को छोड़ो और प्रेम बांटो।

बस बांटो, और तुम अपने भीतर असीम शांति व मौन का अनुभव करोगे। यही तुम्हारा ध्यान बन जाएगा।

ध्यान में उतरने की विभिन्न दिशाएं हैं; और शायद तुम्हारी दिशा यही हो।

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सभी धर्म तुमसे अपने अहंकार को छोड़ने के बाबत कहते रहे हैं, लेकिन यह एक बड़ी विचित्र बात है: वे चाहते हैं, तुम अपना अहंकार छोड़ दो, और अहंकार सिर्फ परमात्मा की छाया की है। परमात्मा पूरे विश्व का अहंकार है, अहंकार तुम्हारा व्यक्तित्व है। धर्मों के अनुसार जैसे परमात्मा इस अस्तित्व का केंद्र है, इसी भांति अहंकार, तुम्हारे व्यक्तित्व और तुम्हारे मन का भी केंद्र है। वे सभी अहंकार को छोड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन यह तब तक नहीं छोड़ा जा सकता है, जब तक कि परमात्मा को ही न छोड़ दिया जाए। तुम एक छाया या प्रतिबिंब को तब तक नहीं छोड़ सकते जब तक कि उसके प्रत्यक्ष स्रोत को ही नष्ट न कर दिया जाए।

इसलिए सदियों से सभी धर्म यह निरंतर कहते आ रहे हैं कि तुम्हें अपने अहंकार से मुक्त हो जाना चाहिए, लेकिन ऐसा वे गलत कारणों से कह रहे हैं। वे सभी अहंकार छोड़ने के लिए इस लिए कह रहे हैं, ताकि तुम परमात्मा को समर्पित हो सको, जिससे तुम पुरोहितों को समर्पण कर सको, जिससे तुम किसी भी तरह के व्यर्थ के अंधविश्वासों, धर्मशास्रों और किसी भी भांति की विश्वास पद्धति के प्रति समर्पित हो सको।

लेकिन अगर यह अहंकार परमात्मा का ही एक प्रतिबिंब है, तो तुम उसे छोड़ नहीं सकते। पूरे विश्व में सर्वत्र परमात्मा एक झूठ की भांति व्याप्त है, और इसी तरह तुम्हारे मन में भी अहंकार एक झूठ की भांति विद्यमान है। तुम्हारा मन अपने कद के अनुसार एक बड़े झूठ को प्रतिबिंबित कर रहा है।

धर्मों ने मनुष्यता को एक बहुत बड़ी दुविधा में डाल रखा है: वे परमात्मा की प्रशंसा और अहंकार की निंदा किए चले जाते हैं। इसलिए लोग एक खंडित स्थिति में बने रहे। उनके विचारों,कार्यों और अनुभवों के बीच कोई संबंध न रहा और वे मानसिक रूप से रुग्ण हो गए। उन्होंने अहंकार को छोड़ने का कठोर प्रयास किया, लेकिन जितना वे छोडने का प्रयास करते, उसे छोड़ना उतना ही अधिक कठिन हो गया, क्योंकि उसे छोड़ने वाला था कौन? अहंकार स्वयं अपने को छोड़ने का प्रयास कर रहा था, जो असंभव था। इसीलिए तथाकथित धार्मिक लोगों में, जो सबसे अधिक विनम्र होते हैं, उनमें भी अहंकार बहुत सूक्ष्म हो जाता है, लेकिन वह गिरता नहीं है। तुम संतों की आंखों में देख सकते हो

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महावीर ने जो कहा है, उसमें बदलने की कोई जगह नहीं है। कृष्ण ने जो कहा है, उसमें बदलने की कोई जगह नहीं है। बुद्ध ने जो कहा है, उसमें बदलने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए कभी-कभी पश्चिम के लोग चिंतित और विचार में पड़ जाते हैं कि महावीर को हुए पच्चीस सौ साल हुए, क्या उनकी बात अभी भी सही है? ठीक है उनका पूछना। क्योंकि पच्चीस सौ साल में अगर दीए से हम सत्य को खोजते हों, तो पच्चीस हजार बार बदलाहट हो जानी चाहिए। रोज नए तथ्य आविष्कृत होंगे और पुराने तथ्य को हमें रूपांतरित करना पड़ेगा।

लेकिन महावीर, बुद्ध या कृष्ण के सत्य रिविलेशन हैं। दीया लेकर खोजे गए नहीं-निर्विचार की कौंध, निर्विचार की बिजली की चमक में देखे गए और जाने गए, उघाड़े गए सत्य हैं। जो सत्य महावीर ने जाना उसमें महावीर एक-एक कदम सत्य को नहीं जान रहे हैं, अन्यथा पूर्ण सत्य कभी भी नहीं जाना जा सकेगा। महावीर पूरे के पूरे सत्य को एक साथ जान रहे हैं।

इस महावाक्य से मैं यह आपको कहना चाहता हूं कि इस छोटे से दो वचनों के महावाक्य में पूरब की प्रज्ञा ने जो भी खोजा है, वह सभी का सब इकट्ठा मौजूद है। वह पूरा का पूरा मौजूद है। इसलिए भारत में हम निष्कर्ष पहले, कनक्लूजन पहले, प्रकि"या बाद में। पहले घोषणा कर देते हैं, सत्य क्या है, फिर वह सत्य कैसे जाना जा सकता है, वह सत्य कैसे जाना गया है, वह सत्य कैसे समझाया जा सकता है, उसके विवेचन में पड़ते हैं। यह घोषणा है। जो घोषणा से ही पूरी बात समझ ले, शेष किताब बेमानी है। पूरे उपनिषद में अब और कोई नई बात नहीं कही जाएगी। लेकिन बहुत-बहुत मार्गों से इसी बात को पुनः-पुनः कहा जाएगा। जिनके पास बिजली कौंधने का कोई उपाय नहीं है, जो कि जिद पकड़कर बैठे हैं कि दीए से ही सत्य को खोजेंगे, शेष उपनिषद उनके लिए है। अब दीए को पकड़कर, बाद की पंक्तियों में एक-एक टुकड़े के सत्य की बात की जाएगी। लेकिन पूरी बात इसी सूत्र पर हो जाती है। इसलिए मैंने कहा कि यह सूत्र अनूठा है। सब इसमें पूरा कह दिया गया है। उसे हम समझ लें, क्या कह दिया गया है!

कहा है कि पूर्ण से पूर्ण पैदा होता है, फिर भी पीछे सदा पूर्ण शेष रह जाता है। और अंत में, पूर्ण में पूर्ण लीन हो जाता है, फिर भी पूर्ण कुछ ज्यादा नहीं हो जाता है; उतना ही होता है, जितना था।

यह बहुत ही गणित-विरोधी वक्तव्य है, बहुत एंटी-मैथमेटिकल है

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जब तक दुनिया में हम एक आदमी को दूसरे आदमी से कम्पेयर करेंगे, तुलना करेंगे तब तक हम एक गलत रास्ते पर चले जाएंगे। वह गलत रास्ता यह होगा कि हम हर आदमी में दूसरे आदमी जैसा बनने की इच्छा पैदा करते हैं; जब कि कोई आदमी किसी दूसरे जैसा न बना है और न बन सकता है। राम को मरे कितने दिन हो गए, या क्राइस्ट को मरे कितने दिन हो गए? दूसरा क्राइस्ट क्यों नहीं बन पाता और हजारों-हजारों क्रिश्चिएन कोशिश में तो चौबीस घंटे लगे हैं कि क्राइस्ट बन जाएं। और हजारों हिंदु राम बनने की कोशिश में हैं, हजारों जैन, बुद्ध, महावीर बनने की कोशिश में लगे हैं, बनते क्यों नहीं एकाध? एकाध दूसरा क्राइस्ट और दूसरा महावीर पैदा क्यों नहीं होता? क्या इससे आंख नहीं खुल सकती आपकी? मैं रामलीला के रामों की बात नहीं कह रहा हूं, जो रामलीला में बनते हैं राम। आप समझ लें कि उनकी चर्चा कर रहा हूं, कई लोग राम बन जाते हैं। वैसे तो कई लोग बन जाते हैं, कई लोग बुद्ध जैसे कपड़े लपेट लेते हैं और बुद्ध बन जाते हैं। कोई महावीर जैसा कपड़ा लपेट लेता है या नंगा हो जाता है और महावीर बन जाता है। उनकी बात नहीं कर रहा। वे सब रामलीला के राम हैं, उनको छोड़ दें। लेकिन राम कोई दूसरा पैदा होता है? यह आपको जिंदगी में भी पता चलता है कि ठीक एक आदमी जैसा दूसरा आदमी कहीं हो सकता है? एक कंकड़ जैसा दूसरा कंकड़ भी पूरी पृथ्वी पर खोजना कठिन है, एक जड़ कंकड़ जैसा-यहां हर चीज यूनिक है, हर चीज अद्वितीय है। और जब तक हम प्रत्येक की अद्वितीय प्रतिभा को सम्मान नहीं देंगे तब तक दुनिया में प्रतियोगिता रहेगी, प्रतिस्पर्धा रहेगी, तब तक दुनिया में मार-काट रहेगी, तब तक दुनिया में हिंसा रहेगी, तब तक दुनिया में सब बेईमानी के उपाय करके आदमी आगे होना चाहेगा, दूसरे जैसा होना चाहेगा। और जब हर आदमी दूसरे जैसा होना चाहता है तो क्या फल होता है? फल यह होता है-अगर एक बगीचे में सब फूलों का दिमाग फिर जाए या बड़े-बड़े आदर्शवादी नेता वहां पहुंच जाएं या बड़े-बड़े शिक्षक वहां पहुंच जाएं और उनको समझाएं कि देखो, चमेली का फूल चंपा जैसा हो जाए, चमेली का फूल चंपा जैसा, चंपा का फूल जुही जैसा, क्योंकि देखो, जुही कितनी सुंदर है...और सब फूलों को अगर पागलपन जाए, हालांकि नहीं सकता! क्योंकि आदमी से पागल फूल नहीं है। आदमी से ज्यादा जड़ता उनमें नहीं है कि वे चक्कर में पड़ जाएं। शिक्षकों के, उपदेशकों के, संन्यासियों के, साधुओं के, आदर्शवादियों केचक्कर में कोई फूल नहीं पड़ेगा। लेकिन फिर भी समझ लें, कल्पना कर लें कि कोई आदमी पहुंच जाए और समझाए उनको और वे चक्कर में जाएं और चमेली का फूल चंपा का फूल होने लगे तो क्या होगा उस बगिया में। उस बगिया में फूल फिर पैदा नहीं होंगे, उस बगिया में फिर फूल पैदा ही नहीं हो सकते। उस बगिया में फिर पौधे मुरझा जाएंगे, मर जाएंगे। क्यों? क्योंकि चंपा लाख उपाय करे तो चमेली नहीं हो सकती, वह उसके स्वभाव में नहीं है, वह उसके व्यक्तित्व में नहीं है, वह उसकी प्रकृति में नहीं है। चमेली तो चंपा हो ही नहीं सकती। लेकिन क्या होगा? चमेली होने की कोशिश में वह चंपा भी नहीं हो पाएगी। वह जो हो सकती थी, उससे भी वंचित रह जाएगी

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