" मेरा पूरा प्रयास एक नयी शुरुआत करने का है। इस से विश्व- भर में मेरी आलोचना निश्चित है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता "

"ओशो ने अपने देश व पूरे विश्व को वह अंतर्दॄष्टि दी है जिस पर सबको गर्व होना चाहिए।"....... भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, श्री चंद्रशेखर

"ओशो जैसे जागृत पुरुष समय से पहले आ जाते हैं। यह शुभ है कि युवा वर्ग में उनका साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है।" ...... के.आर. नारायणन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति,

"ओशो एक जागृत पुरुष हैं जो विकासशील चेतना के मुश्किल दौर में उबरने के लिये मानवता कि हर संभव सहायता कर रहे हैं।"...... दलाई लामा

"वे इस सदी के अत्यंत अनूठे और प्रबुद्ध आध्यात्मिकतावादी पुरुष हैं। उनकी व्याख्याएं बौद्ध-धर्म के सत्य का सार-सूत्र हैं।" ....... काज़ूयोशी कीनो, जापान में बौद्ध धर्म के आचार्य

"आज से कुछ ही वर्षों के भीतर ओशो का संदेश विश्वभर में सुनाई देगा। वे भारत में जन्में सर्वाधिक मौलिक विचारक हैं" ..... खुशवंत सिंह, लेखक और इतिहासकार


मन भयभीत है, और उसका डरना स्पष्ट और तर्कपूर्ण प्रतीत होता है। इसका सार क्या है? ऐसा कुछ क्यों करना चाहिए जिसमें वह मिट जाए? गौतम बुद्ध से बार-बार पूछा जाता था: ‘आप बहुत अजीब व्यक्ति हैं। हम तो यहां अपने आत्म अनुभव के लिए आए थे और आपका ध्यानआत्मा काअनुभव कराना है।सुकरात एक महान प्रज्ञावान पुरुष था , लेकिन वह मन तक सीमित था: ‘स्वयं को जानो लेकिन जानने के लिए कोई ' स्वयं ' है ही नहीं झेन की घोषणा है कि ' जानने को आत्मा जैसा कुछ है ही नहीं।जानने जैसा कुछ भी नहीं है। तुम्हें बस पूर्ण के साथ एक हो जाना है। और भयभीत होने की कोई आवश्यकता ही नहीं है... जरा क्षण भर के लिए सोचो: जब तुम्हारा जन्म नहीं हुआ था, क्या कोई व्यग्रता, कोई चिंता या कोई पीड़ा थी? तुम थे ही नहीं, तो कोई समस्या भी थी। समस्या तो तुम स्वयं ही हो, तुमसे ही समस्या शुरू होती हैं , और ज्यों -ज्यों तुम बडे होते हो, अधिक से अधिक समस्याएं बढ़ जाती हैं...लेकिन तुम्हारे जन्म से पूर्व, क्या कोई समस्या थी? झेन सदगुरु नवागतों से निरंतर पूछते थे--‘ तुम अपने पिता के जन्म के पूर्व कहां थे? ' एक निरर्थक सा प्रश्न है लेकिन बहुत महत्वपूर्ण। वे तुमसे पूछ रहे हैंयदि तुम नहीं थे तो कोई समस्या थी ही नहीं, इसलिए फिक्र करने की बात क्या है? यदि तुम्हारी मृत्यु अंतिम मृत्यु बन जाती है, और सारी सीमाएं मिट जाती हैं, तो तुम नहीं रहोगे, लेकिन अस्तित्व तो होगा ही। नृत्य तो होगा, पर नर्तक नहीं होगा गीत तो होगा, पर गायक नहीं होगा। यह अनुभव केवल तभी संभव है, जब तुम मन के पार अपने अस्तित्व की गहराइयों में उतरो, उस केंद्र अथवा जीवन के स्त्रोत पर पहुंचो, जहां से तुम्हारा जीवन प्रवाहित रहा है। अचानक तुम्हें अनुभव होता है कि तुम्हारी स्वयं की छवि दूसरों के मत पर आधारित थी। तुम छविहीन और अनंत हो। तुम एक पिंजरे में रह रहे थे। जिस क्षण तुम यह अनुभव करते हो कि तुम्हारे स्त्रोत अनंत हैं, अचानक पिंजरा विलुप्त हो जाता है, और तुम नीलाकाश में उड.ने के लिए अपने पंख खोल सकते हो और आकाश में जाकर विलुप्त हो सकते हो। यह विलुप्त होना ही अनत्ता है, यह मिट जाना ही स्वयं से मुक्त हो जाना है। लेकिन यह बुद्धि के द्वारा होना संभव नहीं है, यह केवल ध्यान के द्वारा हो सकता है।झेनध्यान का ही दूसरा नाम है। डी. टी. सुजूकी जैसे विलक्षण व्यक्ति ने पश्चिमी जगत को झेन से परिचित कराया, और इसी के फलस्वरूप पश्चिम में सैंकडों बहुत सुंदर पुस्तकेंझेनपर लिखी गई। उसने पथ प्रदर्शक का कार्य किया, लेकिन वह स्वयं कोई झेन सदगुरु था और ही ध्यानी व्यक्ति ही था। वह एक महान विद्वान था और उसका प्रभाव सभी देशों के बुद्धिजीवियों तक फैला। वह तुरंत ही पश्चिम के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। जैसे जैसे पुराने धर्म विशेषरूप से पश्चिम में लडखडा रहे हैं... ईसाई धर्म के साम्राज्य की जडें हिल गई हैं। वे लोग उसे संभालने का भरसक प्रयास कर रहे हैं, पर यह संभव नहीं है। उसकी इमारत धराशायी हो रही है। और प्रतिदिन एक खाई बडी से बडी होती जा रही है, अथाह पाताल जैसी गहराई, जिसे देख कर चक्कर आने लगते हैं। ज्यां पाल सात्र की पुस्तकनॉसियाबहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है। एक बार तुम जब इस अर्थहीन जीवन को, अतल खाई को देखते हो कि तुम्हारा पूरा अस्तित्व संयोगवशात है, अनावश्यक है, एक दुर्घटना है , तुम सारी गरिमा खो देते हो। और तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो ? कुछ भी नहीं है प्रतीक्षा करने के लिए--सिवाय मृत्यु के। यह अत्याधिक व्यग्रता उत्पन्न करती है: "हमारा कोई मूल्य नहीं है... किसी को हमारी जरूरत नहीं है... अस्तित्व हमारी उपेक्षा कर रहा है।" उसी समय डी. टी. सुजूकी पश्चिम के क्षितिज में प्रकट हुए। वह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने पश्चिम में जाकर वहां के कालेजों और विश्वविद्यालयों मेंझेनपर चर्चा की। उन्होंने वहां के बुद्धिजीवियों को तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया चूंकि वे लोग परमात्मा पर विश्वास खो बैठे थे, वे लोग पवित्र बाइबल पर अपनी आस्था खो बैठे थे और उन्हें पोप पर भी कोई श्रद्धा नहीं रह गई थी। आज ही जर्मनी के लगभग एक दर्जन बिशपों ने एक साथ मिलकर यह घोषणा की है कि पोप अपनी सीमाओं के बाहर जाकर निरंतरबर्थ-कंट्रोलके विरुद्ध जो उपदेश दे रहे हैं, वे मनुष्यता को एक ऐसे बिंदु पर ले गए हैं, जहां लगभग आधा विश्व निकट भविष्य में भूख से मरने जा रहा है, और अब पोप की बातों को सुनना ही नहीं चाहिए। अब यह विशुद्ध विद्रोह है। इन एक दर्जन बिशप ने जर्मनी में एक कमेटी का गठन किया और वे पोप के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए अपने पक्ष में अधिक से अधिक बिशप जुटा रहे हैं और यह घोषणा कर रहे हैं कि पोप भूल कर रहे हैं। पूरा इतिहास यह प्रदर्शित करता है कि पोप और बिशप लोग भ्रष्ट, (फालिबुल) हो सकते हैं, इसलिए यह पूरी सोच कि पोप से कभी कोई भूल होती ही नहीं, इसने उन्हें पूरा तानाशाह बना दिया है और अब यह सहन नहीं किया जा सकता। इस सदी का प्रारंभ ही, विशेष रूप से पश्चिम के समृद्ध देशों में, सभी पुराने धर्मों के विरुद्ध उबलती हुई ऊर्जा के साथ हुआ। निर्धन देशों के पास तो इस सोच विचार के लिए कोई समय है, और भरण पोषण के लिए पर्याप्त भोजन। उनका पूरा समय रोटी, कपडा और मकान की फिक्र में ही बीत जाता है। वे जीवन की महान समस्याओं के बारे में तो सोच सकते हैं और उस पर चर्चा कर सकते हैं। उनके सामने प्रश्न है भोजन का--परमात्मा का नहीं। इसीलिए निर्धन व्यक्ति बहुत आसानी से, केवल भोजन, नौकरी और मकान उपलब्ध करा देने भर से ईसाई बनाए जा सकते हैं। लेकिन ईसाई धर्म में उनका कोई रूपांतरण नहीं होता। तो उनकी दिलचस्पी परमात्मा में होती है, उनकी दिलचस्पी विश्वास करने की किसी व्यवस्था में होती है, उनके लिए मूलभूत समस्या केवल एक होती है कि वे भूखों मर रहे हैं। जब तुम भूखे और अभावग्रस्त हो, तो तुम परमात्मा के बारे में नहीं सोचते, और तुम स्वर्ग और नर्क के बारे में सोचते हो। जो पहली चीज तुम सोचते हो, वह यह है कि कहीं से दाल रोटी का जुगाड. किया जाए और यदि कोई व्यक्ति तुम्हें दाल रोटी और आश्रय इस शर्त पर देता है कि तुम्हें एक कैथलिक ईसाई बनना होगा तो तुम भूख से मरने की अपेक्षा ईसाई बनने को राजी हो जाओगे

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एक राजा ने किसी सामान्यत: स्वस्थ और संतुलित व्यक्ति को कैद कर लिया था- एकाकीपन का मनुष्य पर क्या प्रभाव होता है, इस अध्ययन के लिए। वह व्यक्ति कुछ समय तक चीखता रहा चिल्लाता रहा। बाहर जाने के लिए रोता था, सिर पटकता था- उसकी सारी सत्ता जो बाहर थी। सारा जीवन तो 'पर' से अन्य बंधा था। अपने में तो वह कुछ भी नहीं था। अकेला होना न होने के ही बराबर था। वह धीरे-धीरे टूटने लगा। उसके भीतर कुछ विलीन होने लगा, चुप्पी आ गई। रुदन भी चला गया। आंसू भी सूख गये और आंखें ऐसे देखने लगीं, जैसे पत्थर हों। वह देखता हुआ भी लगता जैसे नहीं देख रहा है। दिन बीते, वर्ष बीत गया। उसकी सुख सुविधा की सब व्यवस्था थी। जो उसे बाहर उपलब्ध नहीं था, वह सब कैद में उपलब्ध था। शाही आतिथ्य जो था! लेकिन वर्ष पूरे होने पर विशेषज्ञों ने कहा, 'वह पागल हो गया है।' ऊपर से वह वैसा ही था। शायद ज्यादा ही स्वस्थ था, लेकिन भीतर? भीतर एक अर्थ में वह मर ही गया था। मैं पूछता हूं : क्या एकाकीपन किसी को पागल कर सकता है? एकाकीपन कैसे पागल करेगा? वस्तुत: पागलपन तो पूर्व से ही है। बाह्य संबंध उसे छिपाये थे। एकाकीपन उसे अनावृत कर देते हैं। मनुष्य को भीड़ में खोने की अकुलाहट उससे बचने के लिए ही है। प्रत्येक व्यक्ति इसलिए ही स्वयं से पलायन किये हुए है। पर यह पलायन स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है। तथ्य को न देखना, उससे मुक्त होना नहीं है। जो नितांत एकाकीपन में स्वस्थ और संतुलित नहीं है, वह धोखे में है। यह आत्मवंचन कभी न कभी खंडित होगी ही और वह जो भीतर है, उसे उसकी परिपूर्ण नग्नता में जानना होगा। यह अपने आप अनायास हो जाए, तो व्यक्तित्व छिन्न-भिन्न और विक्षिप्त हो जाता है। जो दमित है, वह कभी न कभी विस्फोट को भी उपलब्ध होगा। धर्म इस एकाकीपन में स्वयं उतरने का विज्ञान है। क्रमश: एक-एक परत उघाड़ने पर अद्भुत सत्य का साक्षात होता है। धीरे-धीरे ज्ञात होता है कि वस्तुत: हम अकेले ही हैं। गहराई में, आंतरिकता के केंद्र पर प्रत्येक एकाकी है। परिचित होते ही भय की जगह अभय और आनंद ले लेता है। एकाकीपन के घेरे में स्वयं सच्चिदानंद विराजमान है। अपने में उतरकर स्वयं प्रभु को पा लिया जाता है। इससे कहता हूं- अकेलेपन से, अपने से भागो मत, वरन अपने में डूबो। सागर में डूब कर ही मोती पाये जाते हैं।

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मेरी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति ठीक अर्थों में शिक्षक तभी हो सकता है जब उसमें विद्रोह की एक अत्यंत ज्वलंत अग्नि हो। जिस शिक्षक के भीतर विद्रोह की अग्नि नहीं है वह केवल किसी न किसी निहित, स्वार्थ का, चाहे समाज, चाहे धर्म, चाहे राजनीति, उसका एजेंट होगा। शिक्षक के भीतर एक ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए विद्रोह की, चिंतन की, सोचने की। लेकिन क्या हममें सोचने की अग्नि है और अगर नहीं है तो आप भी एक दुकानदार हैं। शिक्षक होना बड़ी और बात है। शिक्षक होने का मतलब क्या है? क्या हम सोचते हैं-आप बच्चों को सिखाते होंगे, सारी दुनिया में सिखाया जाता है बच्चों को, बच्चों को सिखाया जाता है, प्रेम करो! लेकिन कभी आपने विचार किया है कि आपकी पूरी शिक्षा की व्यवस्था प्रेम पर नहीं, प्रतियोगिता पर आधारित है। किताब में सिखाते हैं प्रेम करो और आप की पूरी व्यवस्था, पूरा इंतजाम प्रतियोगिता का है।

जहां प्रतियोगिता है वहां प्रेम कैसे हो सकता है। जहां काम्पिटीशन है, प्रतिस्पर्धा है, वहां प्रेम कैसे हो सकता है। प्रतिस्पर्धा तो ईर्ष्या का रूप है, जलन का रूप है। पूरी व्यवस्था तो जलन सिखाती है। एक बच्चा प्रथम आ जाता है तो दूसरे बच्चों से कहते हैं कि देखो तुम पीछे रह गए और यह पहले आ गया। आप क्या सिखा रहे हैं? आप सिखा रहे हैं कि इससे ईर्ष्या करो, प्रतिस्पर्धा करो, इसको पीछे करो, तुम आगे आओ। आप क्या सिखा रहे हैं? आप अहंकार सिखा रहे हैं कि जो आगे है वह बड़ा है जो पीछे है वह छोटा है। लेकिन किताबों में आप कह रहे हैं कि विनीत बनो और किताबों में आप समझा रहे हैं कि प्रेम करो; और आपकी पूरी व्यवस्था सिखा रही है कि घृणा करो, ईर्ष्या करो, आगे निकलो, दूसरे को पीछे हटाओ और आपकी पूरी व्यवस्था उनको पुरस्कृत कर रही है। जो आगे आ रहे हैं उनको गोल्ड मेडल दे रही है, उनको सर्टिफिकेट दे रही है, उनके गलों में मालाएं पहना रही है, उनके फोटो छाप रही है; और जो पीछे खड़े हैं उनको अपमानित कर रही है। तो जब आप पीछे खड़े आदमी को अपमानित करते हैं तो क्या आप उसके अहंकार को चोट नहीं पहुंचाते कि वह आगे हो जाए? और जब आगे खड़े आदमी को आप सम्मानित करते हैं तो क्या आप उसके अहंकार को प्रबल नहीं करते हैं? क्या आप उसके अहंकार को नहीं फुसलाते और बड़ा करते हैं? और जब ये बच्चे इस भांति अहंकार में, ईर्ष्या में, प्रतिस्पर्धा में पाले जाते हैं तो यह कैसे प्रेम कर सकते हैं। प्रेम का हमेशा मतलब होता है कि जिसे हम प्रेम करते हैं उसे आगे जाने दें। प्रेम का हमेशा मतलब है, पीछे खड़े हो जाना।
एक छोटी सी कहानी कहूं, उससे खयाल में आए। तीन सूफी फकीरों को फांसी दी जा रही थी और दुनिया में हमेशा धार्मिक आदमी संतों के खिलाफ रहे हैं। तो धार्मिक लोग उन फकीरों को फांसी दे रहे थे। तीन फकीर बैठे हुए थे कतार में। जल्लाद एक-एक का नाम बुलाएगा और उनको काट देगा। उसने चिल्लाया कि नूरी कौन है, उठ कर आ जाए। लेकिन नूरी नाम का आदमी तो नहीं उठा, एक दूसरा युवक उठा और वह बोला कि मैं तैयार हूं, मुझे काट देंगे। उसने कहा: लेकिन तेरा तो नाम यह नहीं है। इतनी मरने की क्या जल्दी है? उसने कहा: मैंने प्रेम किया और जाना कि जब मरना हो तो आगे हो जाओ और जब जीना हो तो पीछे हो जाओ। मेरा मित्र मरे, उसके पहले मुझे मर जाना चाहिए। और अगर जीने का सवाल हो तो मेरा मित्र जीए, उसके पीछे मुझे जीना चाहिए।

प्रेम तो यही कहता है, लेकिन प्रतियोगिता क्या कहती है? प्रतियोगिता कहती है, मरने वाले के पीछे हो जाना और जीने वाले के आगे हो जाना। और हमारी शिक्षा क्या सिखाती है? प्रेम सिखाती है या प्रतियोगिता सिखाती है? और जब सारी दुनिया में प्रतियोगिता सिखाई जाती हो और बच्चों के दिमाग में काम्पिटीशन और एंबीशन का जहर भरा जाता हो तो क्या दुनिया अच्छी हो सकती है? जब हर बच्चा हर दूसरे बच्चे से आगे निकलने के लिए प्रयत्नशील हो, और जब हर बच्चा हर बच्चे को पीछे छोड़ने के लिए उत्सुक हो, बीस साल की शिक्षा के बाद जिंदगी में वह क्या करेगा? यही करेगा, जो सीखेगा वही करेगा। हर आदमी हर दूसरे आदमी को खींच रहा है कि पीछे आ जाओ। नीचे के चपरासी से लेकर ऊपर के राष्ट्रपति तक हर आदमी एक-दूसरे को खींच रहा है कि पीछे आ जाओ। और जब कोई खींचते-खींचते चपरासी राष्ट्रपति हो जाता है तो हम कहते हैं, बड़ी गौरव की बात हो गई। हालांकि किसी को पीछे करके आगे होने से बड़ा हीनता का, हिंसा का कोई काम नहीं है। लेकिन यह वायलेंस हम सिखा रहे हैं, यह हिंसा हम सिखा रहे हैं और इसको हम कहते हैं, यह शिक्षा है। अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में युद्ध होते हों तो आश्चर्य कैसा! अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में रोज लड़ाई होती हो, रोज हत्या होती हो तो आश्चर्य कैसा! अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में झोपड़ों के करीब बड़े महल खड़े होते हों और उन झोपड़ों में मरते लोगों के करीब भी लोग अपने महलों में खुश रहते हों तो आश्चर्य कैसा! इस दुनिया में भूखे लोग हों और ऐसे लोग हों जिनके पास इतना है कि क्या करें, उनकी समझ में नहीं आता। यह इस शिक्षा की बदौलत है, यह इस शिक्षा का परिणाम है। यह दुनिया इस शिक्षा से पैदा हो रही है और शिक्षक इसके लिए जिम्मेवार है, और शिक्षक की नासमझी इसके लिए जिम्मेवार है। वह शोषण का हथियार बना हुआ है। वह हजार तरह के स्वार्थों का हथियार बना हुआ है, इस नाम पर कि वह शिक्षा दे रहा है, बच्चों को शिक्षा दे रहा है!

अगर यही शिक्षा है तो भगवान करे कि सारी शिक्षा बंद हो जाए तो भी आदमी इससे बेहतर हो सकता है। जंगली आदमी शिक्षित आदमी से बेहतर है। उसमें ज्यादा प्रेम है और कम प्रतिस्पर्धा है, उसमें ज्यादा हृदय है और कम मस्तिष्क है; लेकिन इससे बेहतर वह आदमी है। लेकिन हम इसको शिक्षा कह रहे हैं! और हम करीब-करीब जिन-जिन बातों को कहते हैं कि तुम यह करना, उनसे उलटी बातें हम, पूरा सरंजाम हमारा, उलटी बातें सिखाता है!


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ज्ञान के लिए पिपासा है। कितनी प्यास है? प्रत्येक में देखता हूं। कुछ भीतर प्रज्ज्वलित है, जो शांत होना चाहता है और मनुष्य कितनी दिशाओं में खोजता है। शायद अनंत जन्मों से उसकी यह खोज चली आ रही है। पर हर चरण पर निराशा के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं आता है। कोई रास्ता पहुंचता हुआ नहीं दिखता है। क्या रास्ते कहीं भी नहीं ले जाते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना है। जीवन स्वयं इसका उत्तर है। क्या अनंत मार्गो और दिशाओं में चलकर उत्तर नहीं मिल गया है?
बौद्धिक उत्तर खोजने में, उसके धुएं में, वास्तविक उत्तर खो जाता है। बुद्धि चुप हो तो अनुभूति बोलती है। विचार मौन हों तो विवेक जाग्रत होता है।
वस्तुत: जीवन के आधारभूत प्रश्नों के उत्तर नहीं होते हैं। समस्याएं हल नहीं होती हैं, गिर जाती हैं। केवल पूछने और शून्य हो जाने की बात है। बुद्धि केवल पूछ सकती है। समाधान उससे नहीं शून्य से आता है।
'समाधान शून्य से आता है,' इसी सत्य को जानते ही एक नये आयाम पर जीवन का उद्घाटन प्रारंभ हो जाता है। चित्त की इसी स्थिति का नाम समाधि है।
पूछें और चुप हो जाएं- बिलकुल चुप और समाधान को आने दें, उसे फलने दें। चित्त की इस निस्तरंग स्थिति में दर्शन होता है, उसका-जो है, जो मैं हूं।
स्वयं को जाने बिना ज्ञान की प्यास नहीं मिटती है।
सब मार्ग छोड़कर स्वयं पर पहुंचना होता है। चित्त जब किसी मार्ग पर नहीं है, तब स्वयं में है और स्वयं को जानना ज्ञान है। शेष सब जानकारी है, क्योंकि परोक्ष है। विज्ञान ज्ञान नहीं है। वह सत्य को नहीं, केवल उपयोगिता को जानना है। सत्य केवल अपरोक्ष ही जाना जा सकता है और ऐसी सत्ता केवल स्वयं की ही है, जो कि अपरोक्ष जानी जा सकती है।
चित्त जिस क्षण खोज की व्यर्थता को जानकर चुप और थिर रह जाता है, उसी क्षण अनंत के द्वार खुल जाते हैं।
दिशा-शून्य चेतना प्रभु में विराजमान हो जाती है और ज्ञान की प्यास का अंत केवल प्रभु में ही है।

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सदियों से यह बार-बार कहा जाता है। सारे धार्मिक लोग यह कहते रहे हैं: "हम इस जगत में अकेले आए हैं, और हम अकेले जाएंगे।' सारा साथ होना माया है। साथ होने का विचार ही इस कारण आता है क्योंकि हम अकेले हैं, और अकेलापन तकलीफ देता है। हम अपने अकेलेपन को रिश्ते में डुबो देना चाहते हैं...इसी कारण हम प्रेम में इतना उलझ जाते हैं। इस बिंदु को देखने की कोशिश करो। सामान्यतया तुम सोचते हो कि तुम पुरुष या स्त्री के प्रेम में पड़ गए क्योंकि वह सुंदर है। यह सत्य नहीं है। सत्य इसके ठीक विपरीत है: तुम प्रेम में पड़े क्योंकि तुम अकेले नहीं रह सकते। तुम्हें गिरना ही पड़ेगा। तुम अपने को इस या उस तरह से टालने ही वाले थे। और यहां ऐसे लोग हैं जो स्त्री या पुरुष के प्रेम में नहीं पड़ते--तब वे धन के प्रेम में पड़ते हैं। वे धन की तरफ या शक्ति की तरफ जाने लगते हैं, वे राजनेता बन जाते हैं। वह भी तुम्हारे अकेलेपन को टालना है। यदि तुम मनुष्य को देखो, यदि तुम स्वयं को गहराई से देखो, तुम आश्चर्यचकित होओगे--तुम्हारी सारी गतिविधियों को एक अकेले स्रोत में सिकोड़ा जा सकता है। स्रोत यह है कि तुम अपने अकेलेपन से डरते हो। बाकी सारी बातें तो बहाने मात्र हैं। वास्तविक कारण यह है कि तुम अपने को बहुत अधिक अकेला पाते हो।

किसी मोहित करने वाली शाम को आप अपने हमसफर से मिलने वाले हैं, एक पूर्ण व्यक्ति जो आपकी सारी जरूरतों को तृप्त करेगा और आपके सपनों को पूरा करेगा। ठीक? गलत! गीत लिखने वाले और कवि जो फंतासी पालते हैं उसकी जड़ें गर्भ में होती हैं, जहां हम बहुत सुरक्षित और मां के साथ एक थे; इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि हम अपने पूरे जीवन में उसी स्थल पर जाने की चाह रखते हैं। लेकिन, यदि कोरा सच कहा जाए तो यह बचकाना सपना है। और यह विस्मयकारी है कि हम हकीकत के सामने बड़ी ज़िद से अडे रहते हैं। कोई भी, वह वर्तमान में आपका साथी हो या भविष्य में होने वाला सपनों का राजकुमार, आपको थाल में खुशियां परोसने के लिए बाध्य नहीं है--और न ही वे चाहकर भी ऐसा कर नहीं सकते। असली प्रेम हमारी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर होने से नहीं आता, बल्कि हमारी अपनी भीतरी समृद्धि और प्रौढ़ता को विकसित करने से आता है। तब हमारे पास इतना प्रेम होता है देने के लिए कि हम स्वतः ही प्रेमियों को अपनी तरफ खींचते हैं।

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