" मेरा पूरा प्रयास एक नयी शुरुआत करने का है। इस से विश्व- भर में मेरी आलोचना निश्चित है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता "

"ओशो ने अपने देश व पूरे विश्व को वह अंतर्दॄष्टि दी है जिस पर सबको गर्व होना चाहिए।"....... भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, श्री चंद्रशेखर

"ओशो जैसे जागृत पुरुष समय से पहले आ जाते हैं। यह शुभ है कि युवा वर्ग में उनका साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है।" ...... के.आर. नारायणन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति,

"ओशो एक जागृत पुरुष हैं जो विकासशील चेतना के मुश्किल दौर में उबरने के लिये मानवता कि हर संभव सहायता कर रहे हैं।"...... दलाई लामा

"वे इस सदी के अत्यंत अनूठे और प्रबुद्ध आध्यात्मिकतावादी पुरुष हैं। उनकी व्याख्याएं बौद्ध-धर्म के सत्य का सार-सूत्र हैं।" ....... काज़ूयोशी कीनो, जापान में बौद्ध धर्म के आचार्य

"आज से कुछ ही वर्षों के भीतर ओशो का संदेश विश्वभर में सुनाई देगा। वे भारत में जन्में सर्वाधिक मौलिक विचारक हैं" ..... खुशवंत सिंह, लेखक और इतिहासकार

Archive for September 2010



राम को कितने दिन हुए, कोई राम पैदा नहीं होता। हाँ, रामलीला के राम बहुत पैदा हुए। रामलीला के राम बनना शोभापूर्ण है? रामलीला के राम बनना गरिमापूर्ण है? यह भी हो सकता है कि रामलीला का राम इतना कुशल हो जाये बार-बार रामलीला करते हुए कि असली राम से अगर प्रतिस्पर्धा करवाई जाये तो असली राम हार जाये।

यह भी हो सकता है। क्योकि असली राम से भूल भी होती है, चूक भी होती है, नकली राम से कोई भूल-चूक नहीं होती, नकली आदमी भूल-चूक करता ही नहीं। क्योकि उसे तो सब पार्ट याद करके करना होता है। राम को तो बेचारे को पाठ याद करने की सुविधा नहीं थी, सीता खो गयी तो उन्हें कोई बताने वाला नहीं था की अब किस तरह छाती पीटो और क्या कहो। जो हुआ होगा वह सहज हुआ होगा। वह स्पोंटेनिय्स था। कही कोई लिखी हुई किताब से याद किया हुआ नहीं था, इसलिए भूल-चूक भी हो सकती है।

लेकिन रामलीला का राम बिलकुल कुशल होता है, उससे भूल-चूक नहीं होती, उसका सब तैयार है। सब डायलोग, सब भाषण, सब तैयार है, सब पहले से निश्चित है। और फिर चार-चार बार मौका मिलता है उसको, राम को तो एक ही बार मौका मिला था, रामलीला के राम को तो हार साल मौका मिलता है। तो यह इतना कुशल हो जाता है कि अगर दोनों राम को लाकर आमने सामने खड़े कर दिए जाये तो असली राम की तो कोई फिकर ही न करे और नकली राम के लोग पैर छुए।

ऐसा एक दफा हो भी गया। चार्ली चेपलिन का नाम तो सुना होगा। वह एक हंसोड़ अभिनेता था। उसकी पचासवी वर्षगाठ बड़ी जोर शोर से मनाई गयी थी। और उस वर्षगाठ पर एक आयोजन किया गया सारे यूरोप और अमेरिका में। अभिनेताओ को निमंत्रित किया गया कि वे चार्ली चेपलिन का अभिनय करे। ऐसे सौ अभिनेता सारी दुनिया से चुने जायेंगे। प्रतियोगिता होगी नगरो- नगरो में। और फिर अंतिम प्रतियोगिता होगी। और उस अंतिम प्रतियोगिता में तीन व्यक्ति चुने जायेंगे जो चार्ली चेपलिन का अभिनय करने में सर्वाधिक कुशल होंगे। उन तीनो को पुरस्कार दिया जायेगा।

प्रतियोगिता हुई, हजारो अभिनेताओ ने भाग लिया, एक से एक अभिनेता, चार्ली चेपलिन बना, बनने की कोशिस की। चार्ली चेपलिन के मन में हुआ कि में भी किसी दुसरे के नाम से फार्म भरकर सम्मलित क्यों न हो जाऊ? मुझे तो प्रथम पुरस्कार मिल ही जाने वाला है, में खुद ही चार्ली चेपलिन हूँ, भला मेरा धोखा और कौन दे सकेगा। और जब बात भी खुल जाएगी, तो एक मजाक हो जाएगी। में तो हंसोड़ अभिनेता हूँ ही, लोग कहेंगे खूब मजाक की इस आदमी ने। वह एक छोटे से गाँव से फार्म भरकर सम्मलित हो गया।

अंतिम प्रतियोगिता हुई, उसमे वह सम्मलित था। सौ लोगो में वह भी एक था, किसी को पता नहीं, वहा तो सौ चार्ली चेपलिन एक से मालूम होते थे, एक सी मूंछ, एक सी चाल, एक सी ढाल, वे सब ही चार्ली चेपलिन थे। प्रतियोगिता हुई, पुरस्कार बंटे, मजाक भी खूब हुई, लेकिन चार्ली चेपलिन ने जो सोची थी वह मजाक नहीं हुई, मजाक उलटी हो गयी। चार्ली चेपलिन को दूसरा स्थान मिल गया। कोई और उसका ही पार्ट करने में नंबर एक आ गया। और जब पता चला दुनिया को तो, दुनिया हैरान रह गयी कि हद हो गयी यह बात तो। चार्ली चेपलिन खुद मौजूद था प्रतियोगिता में और उसे नंबर दो का पुरस्कार मिला।

तो हो सकता महावीर के अनुयायी महावीर को हरा दे, बिलकुल हरा सकते है क्योकि अनुयायी एक नक़ल होता है, असल नहीं। लेकिन नकली आदमी हरा भी दे तो नकली आदमी, नकली आदमी ही रहेगा। उसके भीतर कोई आनंद, कोई विकास, कोई प्रफुल्लता, कोई पूर्णता उपलब्ध नहीं हो सकती।

अभी गाँधी हमारे मुल्क में थे, गाँधी के साथ हजारो नकली गाँधी इस मुल्क में पैदा हो गए थे। उन्होंने मुल्क को डुबो दिया, उन नकली गांधियो ने मुल्क को डुबो दिया। गाँधी जैसी खादी पहनने लगे, गाँधी जैसा चरखा चलने लगे। उन्होंने डुबो दिया इस मुल्क को, जो नकली गाँधी पैदा ही गए थे, इस मुल्क के हत्यारे साबित हुए, मर्डरर्स साबित हुए। डुबो दिया इस मुल्क को, डुबोये जा रहे है रोज। डुबोयेंगे ही। क्योकि नकली आदमी अन्दर से कुछ और होता है और बाहर कुछ और। असली आदमी जो भीतर होता है, वही बाहर भी।

असली आदमी बनना है तो किसी आदर्श को थोपने की कोशिश भूल कर भी मत करना। अन्यथा आप एक नकली आदमी बन जायेंगे और आपका जीवन तो गलत हो ही जायेगा, आपके जीवन की गलती दुसरो तक को नुकसान पहुचायेगी। समाज तब एक धोखा हो जायेगा, एक प्रपंच हो जायेगा। पूरा समाज एक फ्रोड हो जायेगा। क्योकि जब सब नकली आदमी होते है तो बड़ी मुश्किल होती है।

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क्राइस्‍ट कहते हैं, तुम कन्‍फेस कर दो, मैं तुम्‍हें माफ किए देता हूं। और जो क्राइस्ट पर भरोसा करता है वह पवित्र होकर लोटेगा. असल में क्राइस्‍ट पाप से तो मुक्‍त नहीं कर सकते, लेकिन स्मृति से मुक्‍त कर सकते हे। स्‍मृति ही असली सवाल हे। गंगा पाप से मुक्‍त नहीं कर सकती, लेकिन स्‍मृति से मुक्त कर सकती हे।

अगर कोई भरोसा लेकर गया है। कि गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप से बाहर हो जाऊँगा और ऐसा अगर उसके चित में है। उसकी कलेक्‍टव अनकांशेस में है
, उसके समाज की करोड़ों वर्ष से छुटकारा नहीं होगा वैसे, क्‍योंकि चोरी को अब कुछ और नहीं किया जा सकता। हत्‍या जो हो गई, हो गयी लेकिन यह व्‍यक्‍ति पानी के बाहर जब निकला तो सिंबालिक एक्‍ट हो गया।

क्राइस्‍ट कितने दिन दुनिया में रहेंगे, कितने पापीयों से मिलेंगे, कितने पापी कन्‍फेस कर पाएंगे। इसके लिए हिंदुओं ने ज्‍यादा स्‍थायी व्‍यवस्‍था खोजी है। व्‍यक्‍ति से नहीं बांधा। यह नदी कन्‍फेशन लेती रहेगी। वह नदी माफ करती रहेगी, यह अनंत तक रहेगी, और ये धाराएं स्‍थायी हो जाएंगी।

क्राइस्‍ट कितने दिन रहेंगे। मुश्‍किल से क्राइस्ट तीन साल काम कर पाए
, कुल तीन साल। तीस से लेकर तैंतीस साल की अम्र तक, तीन साल में कितने पापी कन्‍फेस करेंगे। कितने पापी उनके पास आएंगे। कितने लोगों के सिर पर हाथ रखेंगे। यहां के मनीषीयों ने व्‍यक्‍ति से नहीं बांधा, धारा से बाँध दिया।

तीर्थ है
, वहां जाएगा कोई, वह मुक्‍त होकर लौटेगा। तो स्‍मृति से मुक्‍त होगा। स्‍मृति ही तो बंधन है। वह स्वप्न जो आपने देखा, आपका पीछा कर रहा है। असली सवाल वही है, और निश्‍चित ही उससे छुटकारा हो सकता है। लेकिन उस छुटकारे में दो बातें जरूरी है। बड़ी बात तो यह जरूरी है कि आपकी ऐसी निष्‍ठा हो कि मुक्‍ति हो जाएगी। और आपकी निष्‍ठा कैसे होगी। आपकी निष्‍ठा तभी होगी जब आपको ऐसा ख्‍याल हो कि लाखों वर्ष से ऐसा वहां होता रहा है। और कोई उपाय नहीं है।
इसलिए कुछ तीर्थ तो बिलकुल सनातन है— जैसे काशी, वह सनातन है। सच बात यह है, पृथ्‍वी पर कोई ऐसा समय नहीं जब काशी तीर्थ नहीं था। वह एक अर्थ में सनातन है। बिलकुल सनातन है। यह आदमी का पुरानी से पुराना तीर्थ हे। उसका मूल्य बढ़ जाता है। क्‍योंकि इतन बड़ी धारा, सजेशन। वहां कितने लोग मुक्‍त हुए, वहां कितने लोग शांत हुए है। वहां कितने लोगों ने पवित्रता को अनुभव किया है, वहां कितने लोगों के पाप झड़ गए — वह एक लंबी धारा है।

वह सुझाव गहरा होता चला जाता है। वह सरल चित में जाकर निष्‍ठा बन जाएगी। वह
निष्‍ठा बन जाए तो तीर्थ कारगर हो जाता हे। वह निष्‍ठा न बन पाए तो तीर्थ बेकार हो जाता है। तीर्थ आपके बिना कुछ नहीं कर सकता। आपका को-औपरेशन चाहिए। लेकिन आप भी को-औपरेशन तभी देते है कि जब तीर्थ की एक धारा हो एक इतिहास हो।

हिंदू कहते है
, काशी इस जमीन का हिस्‍सा नहीं है। इस पृथ्वी का हिस्‍सा नहीं है। वह अलग ही टुकडा है। वह शिव की नगरी अलग ही है। वह सनातन है। सब नगर बनेंगे, बिगड़ेगे काशी बनी रहेगी। इसलिए कई दफा हैरानी होती है। व्‍यक्‍ति तो खो जाते है— बुद्ध काशी आये, जैनों के तीर्थकर काशी में पैदा हुए और खो गए। काशी ने सब देखा— शंकराचार्य आए, खो गए। कबीर आए खो गए। काशी ने तीर्थ देखे अवतार देखे। संत देखे सब खो गए। उनका तो कहीं कोई निशान नहीं रह जाएगा। लेकिन काशी बनी रहेगी। वह उन सब की पवित्रता को, उन सारे लोगों के पुण्‍य को उन सारे लोगों की जीवन धारा को उनकी सब सुगंध को आत्‍मसात कर लेती है और बनी रहती हे।

यह जो स्‍थिति हे। यह निश्‍चित ही पृथ्‍वी से अलग हो जाती है। मेटाफरीकली। यह इसका अपना एक शाश्‍वत रूप हो गया
, इस नगरी का अपना व्‍यक्‍तित्‍व हो गया। इस नगरी पर से बुद्ध गूजरें, इसकी गलियों में बैठकर कबीर ने चर्चा की है। यह सब कहानी हो गयी। वह सब स्वप्नवत् हो गया। पर यह नगरी उन सबको आत्‍मसात किए है। और अगर कभी कोई निष्‍ठा से इस नगरी में प्रवेश करे तो वह फिर से बुद्ध को चलता हुआ देख सकता है वह फिर से पाश्रर्वनाथ को गुजरते हुए देख सकता है। वह फिर से देखेगा तुलसीदास को वह फिर से देखेगा कबीर को।

अगर कोई निष्‍ठा से इस काशी के निकट जाए तो यह काशी साधारण नगरी न रह जाएगी लंदन या बम्‍बई जैसी। एक असाधारण चिन्‍मय रूप ले लेगी। और इसकी चिन्मयता बड़ी पुरातन है। इतिहास खो जाते है। सभ्यताऐं बनती है। आती है और चली जाती है। और यह अपनी एक अंत: धारा करने के प्रयोजन है। आप भी हिस्‍सा हो गए है एक अंत धारा को संजोए हुए चलती है। इसके रास्‍ते पर खड़ा होना
, इसके घाट पर स्‍नान करना इसमें बैठकर ध्‍यान करने के प्रयोजन है। आप भी हिस्‍सा हो गए है एक अंत: धारा के। यह भरोसा कि मैं ही सब कुछ कर लुंगा, खतरनाक है। प्रभु का सहारा लिया जा सकता है, अनेक रूपों में— उसके तीर्थ में, उसके मंदिरों में उसका सहारा लिया जा सकता है। सहारे के लिए यह सारा आयोजन है।

यह कुछ बातें जो ठीक से समझ में आ सकें वह मैंने कहीं। बुद्धि, जिनको देख पाये समझ पाये
, पर यह पर्याप्‍त नहीं है। बहुत सी बातें है तीर्थ के साथ, जो समझ में नहीं आ सकेंगी पर घटित होती है। जिनको बुद्धि साफ-साफ नहीं देख पाएगी। जिनका गणित नहीं बनाया जा सकेगा। लेकिन घटित होती है।

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हिंदुस्तान में चार - पांच हजार वर्षो से हम करोडो शुद्रो को सता रहे है, परेशान कर रहे है, क्यों? एक शब्द हमने इजाद कर लिया, "शुद्र"। और कुछ लोगो पर हमने चिपका दिया कि वे शुद्र है। फिर हमारी आँखें बंद हो गयी, फिर हम उनके कष्ट नहीं देख सके, क्योकि शुद्र, दरवाजा बंद हो गया। फिर हम उनकी पीडाएं अनुभव नहीं कर सके, फिर हमारा ह्रदय उनके प्रति प्रेम से प्रवाहित नहीं हो सका। एक शब्द हमने उन पर चिपका दिया, "शुद्र"

एक इजाद कर लिया शब्द। और उस शब्द के आधार पर हम पांच हजार साल से करोडो - करोड़ लोगो को परेशान कर रहे है। और हमें यह ख्याल भी पैदा नहीं हुआ कि हम ये क्या कर रहे है ? इसलिए ख्याल पैदा नहीं हुआ क्योकि जिसे हमने शुद्र कह दिया वह हमारे लिए मनुष्य ही नहीं रह गया। उसका मनुष्यों से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया। एक शब्द बड़ा हो गया शुद्र, और मनुष्य से मनुष्य अलग हो गया। वह ठीक हमारे जैसा व्यक्ति, दूसरी तरफ मनुष्यों के बहार हो गया।

अगर उसने वेदों ऋचाएं सुन ली तो हमने उनके कान में शीशा पिघलवा कर भरवा दिया, क्योकि वह सुनने का हक़दार न था, वह शुद्र था। हमें यह ख्याल भी न आया कि उसके भीतर भी हमारे जैसी एक आत्मा है, जो सत्य की खोज करना चाहती है। और अगर उसने वेदों को सुनने की हिम्मत की है, आकांक्षा की है, तो यह स्वागत के योग्य बात है। नहीं, हमें ख्याल नहीं आया। एक शब्द काफी है कि वह शुद्र है और बात ख़त्म हो गई।

हमारे कान बंद हो गए, हमारे प्राण बंद ही गए, हमारे ह्रदय बंद हो गए। हमने हजारो शब्द इजाद कर लिए और ये दीवार की तरह खड़े हुए है।

में एक घर में मेहमान था। उस घर के लोगो ने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यव्हार किया। वे बड़े प्रेम से मुझे दो दिनों तक अपने घर में रखे। चलने से कोई दो घंटे पहले उस घर के मालिक ने मुझसे पुछा "आपकी जाति क्या है ?" उन्हें मेरी जाति का कोई पता नहीं था। और मेरी कोई जाति है भी नहीं, पता हो तो कैसे हो ? तो मैंने उनसे मजाक में कहा कि आप खुद ही सोचे कि मेरी जाति क्या हो सकती है ?

उनके घर में एक छोटा सा बच्चा था, उसने मेरी दाढ़ी वगेरह देख कर कहा कि आप मुसलमान तो नहीं ? मैंने कहा कि अगर तुम कहते हो तो यही सही, मुसलमान ही सही। उस घर में बड़ी चिंता फ़ैल गई। उन सब का मेरे प्रति रुख बदल गया। में दो घंटे में दूसरा आदमी हो गया। उसके पहले में दूसरा आदमी था। एक शब्द बीच में
आ गया "मुसलमान" और में दूसरा आदमी हो गया। में वही था जो दो दिन से था, लेकिन वे बीते दो घंटे भिन्न हो गए।

आते वक्त उन्होंने मेरे पैर पड़े थे, जाते वक्त उस घर में से किसी ने मेरे पैर नहीं पड़े। एक शब्द जो बीच में आ गया। आते वक्त वे ख़ुशी से भरे थे, जाने के बाद शायद उन्होंने अपना घर साफ किया हो। किया जरुर होगा, सफाई की होगी - एक मुसलमान जो घर में आ गया। में वही था, लेकिन एक शब्द बीच में आ गया और सारी बात बदल गई।

हमने न जाने कितने शब्द खड़े किये हुए है जो दीवार की तरह एक-दुसरे मनुष्य को अलग कर रहे है। और मनुष्य को अलग ही नहीं कर रहे है, हमारी आँखों को भी अँधा कर रहे है, हमारे प्राणों को भी बहरा कर रहे है, हमारी संवेदनशीलता को तोड़ रहे है।

जर्मनी में हिटलर ने कोई बीस लाख यहूदियों की हत्या करवाई। किन लोगो ने हत्या की ? वे लोग बहुत बुरे लोग है ? नहीं, वे हमारे जैसे ही लोग है। पांच सौ यहूदी रोज नियमित हत्या किये जाते रहे। कौन लोग हत्या कर रहे थे उनकी ? वे कोई पागल है ? उनके दिमाग ख़राब हो ? या कि वे कोई दैत्य है, राक्षस है ? नहीं हमारे जैसे लोग है। सब बाते हमारे जैसी है। लेकिन एक शब्द है यहूदी, और इस शब्द के साथ उनके प्राण पागल हो गए और उन्होंने वह किया जो मनुष्य को करने में जरा भी शोभा नहीं देता।

हमने अपने मुल्क में क्या किया ? हिन्दुओ ने मुसलमानों के साथ क्या किया ? मुसलमानों ने हिन्दुओ के साथ क्या किया ? छोड़ दे हिन्दू-मुसलमान की बात, मराठी गुजराती के साथ क्या कर सकता है ? गुजराती मराठी के साथ क्या कर सकता है ? हिंदी बोलने वाला गैर-हिंदी बोलने वाले के साथ क्या कर सकता है ? गैर-हिंदी बोलने वाला हिंदी बोलने वाले के साथ क्या कर सकता है ? कुछ शब्द, और इन शब्दों में जहा भरा जा सकता है और हमारे प्राण बिलकुल ही पागल हो सकते है।

ऐसे बहुत से शब्दों की दीवार हमने खड़ी कर ली है। इन शब्दों की दीवारों में जो घिरा है वह आदमी कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता।

शब्दों से मुक्त होना चाहिए। ये एक तो शब्द है, दीवार की तरह मनुष्य-मनुष्य को तोड़ रहे है और साथ ही ये शब्द जीवन के प्रति भी हमारी आखों को नहीं खुलने देते। हम शायद सब तरफ शब्दों को खड़ा कर लेते है। अपने चारो तरफ एक किला बना लेते है शब्दों का, और उसके भीतर छिप जाते है।

और जब भी जीवन में कोई नई घटना घटती है, तो हम पुराने शब्दों से उसकी व्याख्या कर लेते है, और उसका नयापन समाप्त हो जाता है और ख़त्म हो जाता है ।

ओशो,
अंतर की खोज

ये अख़बार की कटिंग श्री गजेन्द्र सिंह जी के द्वारा भेजी गयी थी, और इस पर ओशो के विचार मेल से भेजने की बात कही गयी थी परन्तु में ओशो के इन विचारो को आप सब के सामने रख रहा हूँ।

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हिंदुओं का जो प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है, इस संबंध में समझना होगा कि संस्‍कृत, अरबी जैसी पुरानी भाषाएं बड़ी काव्‍य-भाषाएं है। उनमें एक शब्‍द के अनेक अर्थ होते है। वे गणित की भाषाएं नहीं हे। इसलिए तो उनमें इतना काव्‍य है। गणित की भाषा में एक बात का एक ही अर्थ होता है। दो अर्थ हों तो भ्रम पैदा होता है। इसलिए गणित की भाषा तो बिलकुल चलती है सीमा बांधकर। एक शब्‍द का एक ही अर्थ होना चाहिए। संस्‍कृत, अरबी में तो एक-एक के अनेक अर्थ होते है।

अब ‘धी’ इसका अर्थ तो बुद्धि होता है। पहली सीढी। और धी से ही बनता है ध्‍यान—वह दूसरा अर्थ, वह दूसरी सीढी। अब यह बड़ी अजीब बात है। इतनी तरल है संस्‍कृत भाषा। बुद्धि में भी थोड़ी सह धी है। ध्‍यान में बहुत ज्‍यादा। ध्‍यान शब्‍द भी ‘धी’ से ही बनता है। धी का ही विस्‍तार है। इसलिए गायत्री मंत्र को तुम कैसा समझोगे, यह तुम पर निर्भर है, उसका अर्थ कैसा करोगे।

यह रहा गायत्री मंत्र:

ओम भू भुव: स्‍व: तत्‍सवितुर् देवस्‍य वरेण्‍यं भगो: धी माहि: या: प्र चोदयात्।

वह परमात्‍मा सबका रक्षक है—ओम प्राणों से भी अधिक प्रिय है—भू:। दुखों को दूर करने वाला है—भुव:। और सुख रूप है—स्‍व:। सृष्‍टि का पैदा करनेवाला और चलाने वाला है, स्वप्रेरक—तत्‍सवितुर्। और दिव्‍य गुणयुक्‍त परमात्‍मा के –देवस्‍य। उस प्रकार, तेज, ज्‍योति, झलक, प्रकट्य या अभिव्यक्ति का, जो हमें सर्वाधिक प्रिय है—वरेण्‍यं भवो:। धीमहि:–हम ध्‍यान करें।

अब इसका तुम दो अर्थ कर सकते हो: धीमहि:–कि हम उसका विचार करें। यह छोटा अर्थ हुआ, खिड़की वाला आकाश। धीमहि:–हम उसका ध्यान करें: यह बड़ा अर्थ हुआ। खिड़की के बाहर पूरा आकाश।

मैं तुमसे कहूंगा: पहले से शुरू करो, दूसरे पर जाओ। धीमहि: में दोनों है। धीमहि: तो एक लहर है। पहले शुरू होती है खिड़की के भीतर, क्‍योंकि तुम खिड़की के भीतर खड़े हो। इसलिए अगर तुम पंडितों से पुछोगे तो वह कहेंगे धीमहि: का अर्थ होता है विचार करें, सोचें।

अगर तुम ध्‍यानी से पुछोगे तो वह कहेगा धीमहि; अर्थ सीधा है: ध्‍यान करें। हम उसके साथ एक रूप हो जाएं। अर्थात वह परमात्‍मा—या:, ध्‍यान लगाने की हमारी क्षमताओं को तीव्रता से प्रेरित करे—न धिया: प्र चोदयार्।

अब यह तुम पर निर्भर है। इसका तुम फिर वहीं अर्थ कर सकते हो—न धिया: प्र चोदयात्—वह हमारी बुद्धि यों को प्रेरित करे। या तुम अर्थ कर सकते हो कि वह हमारी ध्‍यान को क्षमताओं को उकसाये। मैं तुमसे कहूंगा, दूसरे पर ध्‍यान रखना। पहला बड़ा संकीर्ण अर्थ है, पूरा अर्थ नहीं।

फिर ये जो वचन है, गायत्री मंत्र जैसे, ये संग्रहीत वचन है। इनके एक-एक शब्‍द में बड़े गहरे अर्थ भर है। यह जो मैंने तुम्‍हें अर्थ किया यह शब्‍द के अनुसार फिर इसका एक अर्थ होता है। भाव के अनुसार, जो मस्‍तिष्‍क से सोचेगा उसके लिए यह अर्थ कहा। जो ह्रदय से सोचेगा। उसके लिए दूसरा अर्थ कहता हे।

वह जो ज्ञान का पथिक है, उसके लिए यह अर्थ कहा। वह जो प्रेम का पथिक है, उसके लिए दूसरा अर्थ। वह भी इतना ही सच है। और यहीं तो संस्‍कृत की खूबी है। यही अरबी लैटिन और ग्रीक की खूबी है। जैसे की अर्थ बंधा हुआ नहीं है। ठोस नहीं, तरल है। सुनने वाले के साथ बदलेगा। सुनने वाले के अनुकूल हो जायेगा। जैसे तुम पानी ढालते, गिलास में ढाला तो गिलास के रूप का हो गया। लोटे में ढाला तो लोटे के रूप का गया। फर्श पर फैला दिया तो फर्श जैसा फैल गया। जैसे कोई रूप नहीं है। अरूप है, निराकार है।

अब तूम भाव का अर्थ समझो:

मां की गोद में बालक की तरह मैं उस प्रभु की गोद में बैठा हूं—ओम, मुझे उसकी असीम वात्सल्य प्राप्‍त हे—भू: मैं पूर्ण निरापद हूं—भुव:। मेरे भीतर रिमझिम-रिमझिम सुख की वर्षा हो रही है। और मैं आनंद में गदगद हूं—स्‍व:। उसके रुचिर प्रकाश से , उसके नूर से मेरा रोम-रोम पुलकित है तथा सृष्‍टि के अनंद सौंदर्य से मैं परम मुग्‍ध हूं—तत्‍स् वितुर, देवस्‍य। उदय होता हुआ सूर्य, रंग बिरंगे फूल, टिमटिमाते तारे, रिमझिम वर्षा, कलकलनादिनी नदिया, ऊंचे पर्वत, हिमाच्‍छादित शिखर, झरझर करते झरने, घने जंगल, उमड़ते-घुमड़ते बादल, अनंत लहराता सागर,–धीमहि:। ये सब उसका विस्‍तार है। हम इसके ध्‍यान में डूबे। यह सब परमात्‍मा है। उमड़ते-घुमड़ते बादल, झरने फूल, पत्‍ते, पक्षी, पशु—सब तरफ वहीं झाँक रहा है। इस सब तरफ झाँकते परमात्‍मा के ध्‍यान में हम डूबे; भाव में हम डूबे। अपने जीवन की डोर मैंने उस प्रभु के हाथ में सौंप दी—या: न धिया: प्रचोदयात्। अब में सब तुम्‍हारे हाथ में सौंपता हूं। प्रभु तुम जहां मुझे ले चलों में चलुंगा।

भक्‍त ऐसा अर्थ करेगा।

और मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इनमें कोई भी एक अर्थ सच है। और कोई दूसरा अर्थ गलत है। ये सभी अर्थ सच है। तुम्‍हारी सीढ़ी पर, तुम जहां हो वैसा अर्थ कर लेना। लेकिन एक खयाल रखना, उससे ऊपर के अर्थ को भूल मत जाना, क्‍योंकि वहां जाना है। बढना है। यात्रा करनी है।


ओशो

अष्‍टावक्र महा गीता

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एक टेलर था। दर्जी था। यह बीमार पडा। करीब-करीब मरने के करीब पहुंच गया था। आखिरी घड़िया गिनता था। अब मर की तब मरा। रात उसने एक सपना देखा कि वह मर गया। और कब्र में दफनाया जा रहा है। बड़ा हैरान हुआ, क्रब में रंग-बिरंगी बहुत सी झंडियां लगी हुई है। उसने पास खड़े एक फ़रिश्ते से पूछा कि ये झंडियां यहाँ क्‍यों लगी है?

दर्जी था, कपड़े में उत्‍सुकता भी स्‍वभाविक थी। उसे फ़रिश्ते ने कहा, जिन-जिन के तुमने कपड़े चुराए है। जितने-जितने कपड़े चुराए है। उनके प्रतीक के रूप में ये झंडियां लगी है। परमात्‍मा इस से तुम्‍हारा हिसाब करेगा। कि ये तुम्‍हारी चोरी का रहस्‍य खोल देंगी, ये झंडियां तुम्‍हारे जीवन का बही खाता है।


वह घबरा गया। उसने कहा, हे अल्‍लाह, रहम कर, झंडियों को कोई अंत ही न था। दुर तक झंडियां ही झंडियां लगी थी। जहां तक आंखें देख पा रही थी। और अल्‍लाह की आवाज से घबराहट में उसकी नींद खुल गई। बहुत घबरा गया। पर न जाने किस अंजान कारण के वह एक दम से ठीक हो गया। फिर वह दुकान पर आया तो उसके दो शागिर्द थे जो उसके साथ काम करते थे। वह उन्‍हें काम सिखाता भी था। उसने उन दोनों को बुलाया और कहा सुनो, अब एक बात का ध्‍यान रखना।


मुझे अपने पर भरोसा नहीं है। अगर कपड़ा कीमती आ जाये तो मैं चुराऊंगा जरूर। पुरानी आदत है समझो। और अब इस बुढ़ापे में बदलना बड़ी कठिन है। तुम एक काम करना, तुम जब भी देखो कि मैं कोई कपड़ा चुरा रहा हूं। तुम इतना ही कह देना, उस्‍ताद जी झंन-झंडी, जोर से कहा देना, दोबारा भी गुरु जी झंन-झंडी। ताकि में सम्‍हल जाऊँ।


शिष्‍यों ने बहुत पूछा कि इसका क्‍या मतलब है गुरु जी। उसने कहा, वह तुम ना समझ सकोगे। और इस बात में ना ही उलझों तो अच्छा हे। तुम बस इतना भर मुझे याद दिला देना, गुरु जी झंन-झंडी। बस मेरा काम हो जाएगा।


ऐसे तीन दिन बीते। दिन में कई बार शिष्‍यों को चिल्‍लाना पड़ता, उस्‍ताद जी। झंडी। वह रूक जाता। चौथे दिन लेकिन मुश्‍किल हो गई। एक जज महोदय की अचकन बनने आई । बड़ा कीमती कपड़ा था। विलायती था। उस्‍ताद घबड़ाया कि अब ये चिल्‍लाते ही हैं। झंन-झंडी। तो उसने जरा पीठ कर ली शिष्‍यों की तरफ से। और कपड़ा मारने ही जा रहा था। कि शिष्‍य चिल्‍लाया, उस्‍ताद जी, झंन-झंडी।


दर्जी ने इसे अनसुना कर दिया पर शिष्‍य फिर चिल्‍लाया, उस्‍ताद जी, झंन-झंडी। उसने कहा बंद करो नालायको, इस रंग के कपड़े की झंडी वहां पर थी ही नहीं। क्‍या झंन-झंडी लगा रखी है। और फिर हो भी तो क्‍या फर्क पड़ता है जहां पर इतनी झंडी लगी है वहां एक और सही।


ऊपर-ऊपर के नियम बहुत गहरे नहीं जाते। सपनों में सीखी बातें जीवन का सत्‍य नहीं बन सकती। भय के कारण कितनी देर सम्‍हलकर चलोगे। और लोभ कैसे पुण्‍य बन सकता है?


–ओशो

एस धम्‍मो सनंतनो,


जीवन में नियम बनाना जितना आसान है, और फिर नियम तुम्हे तय करने है तो कोई मुश्किल काम नहीं है, उतना ही कठिन होता है उनका पालन करना. खुद से तो पीठ फेर लोगे लेकिन उस अल्लाह से, उस ईश्वर से कैसे फेरोगे जो सबको देखता है .

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उपनिषद में एक कथा है:-

उद्दालक का बेटा श्वेतकेतु ज्ञान लेकर घर लौटा, विश्वविद्यालय से घर आया। बाप ने देखा, दूर गांव की पगडंडी से आते हुए। उसकी चाल में मस्ती कम और अकड़ ज्यादा थी। सुर्य पीछे से उग रहा था। अंबर में लाली फेल रही थी। पक्षी सुबह के गीत गा रहे थे। पर उद्दालक सालों बाद अपने बेटे को घर लोटते देख कर भी उदास हो गया। क्योंकि बाप ने सोचा था विनम्र होकर लौटेगा। वह बड़ा अकड़ा हुआ रहा था।

अकड़ तो हजारों कोस दूर से ही खबर दे देती है अपनी। अकड़ तो अपनी तरंगें चारों तरफ फैला देती है। वह ऐसा नहीं रहा था की कुछ जान का रहा है। वह ऐसे रहा था जैसे मूढ़ता से भरा हुआ। ऊपर-ऊपर ज्ञान तो संग्रहीत कर लिया है। पंडित होकर रहा है। विद्वान होकर रहा है। प्रज्ञावान होकर नहीं रहा। ज्ञानी हो कर नहीं रहा। कोई अपनी समझ की ज्योति नहीं जली है। अंधेरे शास्त्रों का बोझ लेकर रहा है। बाप दुःखी और उदास हो गया


बेटा आया, उद्दालक ने पूछा कि क्याक्या तू सीख कर आया?


उसने कहा, सब सीख कर आया हूं। कुछ छोड़ा नहीं, यही तो मूढ़ता का वक्तव् है। उसने गिनती करा दी, कितने शास्त्र सीख कर आया हूं। सब वेद कंठस्थ कर लिए है। सब उपनिषद जान लिए है। इतिहास, भूगोल, पुराण, काव्, तर्क, दर्शन, धर्म सब जान लिया है। कुछ छोड़ा नहीं है। सब परीक्षाए पूरी करके आया हूं। स्वर्ण पदक लेकर आया हूं।


बाप ने कहा - लेकिन तूने उस एक को जाना, जिसे जान कर सब जान लिया जाता है?


उसने कहा कैसा एक? किस एक की बात कर रहे है आप? बाप ने कहां, तूने स्वयं को जाना, जिसे जानने से सब जान लिया जाता है। श्वेत केतु उदास हो गया। उसने कहा, उस एक की तो कोई चर्चा वहां हुई ही नहीं।


तो बाप ने कहा, तुझे फिर जान पड़ेगा। क्योंकि हमारे कुल में हम सिर्फ जन् से ही ब्राह्मण नही होते रहे है। हम जान से ब्राह्मण होते है। यह हमारे कुल की परम्परा है। मेरे बाप ने भी मुझे ऐसे ही वापस लौटा दिया था। एक दिन तेरी की तरह मैं भी अकड़ कर घर आया था। सोचकर की सब जान लिया है। सब जान कर रहा हूं। झुका था बाप के चरणों में, लेकिन मैं झुका नहीं था। अंदर से। भीतर तो मेरे यही ख्याल था की मैं अब बाप से ज्यादा विद्वान हो गया हूं। ज्यादा जान गया हूं। लेकिन मेरे पिता उदास हो गये। और उन्होंने कहां वापस जा। उस एक को जान, जिसे जानने से सब जान लिया जाता है। ब्रह्म को जान कर ही हम ब्राह्मण होते है। तुझे भी वापस जाना होगा श्वेतकेतु।


श्वेतकेतु की आंखों मैं पानी गया। और अपने पिता के चरण छुए। और वापस चला गया। घर के अंदर भी गया था। मां ने कहां बेटा आया हैं सालों बाद, बैठने को भी नहीं कहां और कुछ खानें को भी नहीं। कैसे पिता हो। लेकिन श्वेतकेतु ने मां के पैर छुए और जल पिया और कहां मां अब तो उस एक को जान कर ही तुम्हारे चरणों में आऊँगा। जिसे पिता जी ने जाना है। या जिसे हमारे पुरखों ने जाना है। मैं कुल पर कलंक नहीं बनुगां।


श्वेतकेतु गया गुरु के पास। और पूछा गुरूवर - उस एक को जानने के लिए आया हूं। तब गुरु हंसा। और कहां चार सौ गायें बंधी है गो शाला में उन्हें जंगल में ले जा। जब तक वह हजार हो जाये तब तक लोटना। श्वेत केतु चार सौ गायों को ले जंगल में चला गया। गये चरती रहती, उनको देखता रहता। अब हजार होने में तो समय लगेगा। बैठा रहता पेड़ो के नीचे, झील के किनारे, गाय चरती रहती। शाम जब गायें विश्राम करती तब वह भी विश्राम करता। दिन आये, रातें आई, चाँद उगा, चाँद ढला, सूरज निकला, सूरज गया। समय की धीरे-धीरे बोध ही नहीं रहा। क्योंकि समय का बोध आदमी के साथ है।


कोई चिंता नहीं, सुबह की शाम की। अब गायें ही तो साथी है। और वहां ज्ञान जो सालों पढ़ा था उसे ही जुगाल कर ले। किसके साथ करे। खाली होता चला गया श्वेतकेतु गायों की मनोरम स्फटिक आंखे, आसमान की तरह पारदर्शी। देखना कभी गयों की आंखों में झांक कर तुम किसी और ही लोक में पहुंच जाओगे। कैसे निर्दोष और मासूम, कोरी, शुन्यवत होती है गायें की आंखे। उनका का ही संग साथ करते, कभी बैठ कर बांसुरी बजा लेता, अपने अन्दर की बांसुरी भी धीरे-धीरे बजने लगी, सालों गुजर गये। और अचानक गुरु का आगमन हो गया। तब पता चला, मैं यहां किस लिया आया था। तब गुरु ने कहा श्वेतकेतु हो गायें एक हजार एक गाय।


अब तू भी गऊ के समान निर्दोष हो गया है। और तूने उसे भी जान लिया जो पूर्ण से पूर्ण है। पर श्वेतकेतु इतना पूर्ण हो गया की उसमे कहीं मैं का भाव ही नहीं था। श्वेत केतु बुद्ध हो गया, अरिहंत हो गया, जान लिया ब्राह्मा को जब श्वेत केतु अपने घर आया तो ऐसे आया कि उसके पदचाप भी धरा पर नहीं छू रहे थे। तब ऐसे आया विनम्रता आखिरी गहराइयों को छूती हो। मिट कर आया। और जो मिट कर आया। वहीं होकर आया। अपने को खोकर आया। वह अपने का पाकर आया। ये कैसा विरोधा भाष है।


शास्त्र का बोझ नहीं था अब, सत् की निर्भार दशा थी। विचारों की भीड़ थी। अब ध्यान की ज्योति थी। भीतर एक विराट शून् था भीतर एक मंदिर बनाकर आया। एक पूजा ग्रह का भीतर जन् हुआ। अपने होने का जो हमे भेद होता है। वह सब गिर गया श्वेत केतु का, अभेद हो गया। वही जो उठता है निशब्द में। शब्दों के पास।

आज का इंसान भी कुछ ऐसा ही हो गया है जो शिक्षा चाहता है, गोल्ड मेडल चाहता है, सबसे आगे रहना चाहता है, प्रमाण पत्र चाहता है पर ज्ञान नहीं .... ज्ञान के लिए विनम्रता जरुरी है, स्वयं का ज्ञान होना ही ब्रह्म का ज्ञान है .

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