" मेरा पूरा प्रयास एक नयी शुरुआत करने का है। इस से विश्व- भर में मेरी आलोचना निश्चित है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता "

"ओशो ने अपने देश व पूरे विश्व को वह अंतर्दॄष्टि दी है जिस पर सबको गर्व होना चाहिए।"....... भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, श्री चंद्रशेखर

"ओशो जैसे जागृत पुरुष समय से पहले आ जाते हैं। यह शुभ है कि युवा वर्ग में उनका साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है।" ...... के.आर. नारायणन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति,

"ओशो एक जागृत पुरुष हैं जो विकासशील चेतना के मुश्किल दौर में उबरने के लिये मानवता कि हर संभव सहायता कर रहे हैं।"...... दलाई लामा

"वे इस सदी के अत्यंत अनूठे और प्रबुद्ध आध्यात्मिकतावादी पुरुष हैं। उनकी व्याख्याएं बौद्ध-धर्म के सत्य का सार-सूत्र हैं।" ....... काज़ूयोशी कीनो, जापान में बौद्ध धर्म के आचार्य

"आज से कुछ ही वर्षों के भीतर ओशो का संदेश विश्वभर में सुनाई देगा। वे भारत में जन्में सर्वाधिक मौलिक विचारक हैं" ..... खुशवंत सिंह, लेखक और इतिहासकार

Archive for August 2010


अब तिब्‍बत में एक किताब है: तिब्‍बतन बुक ऑफ दि डैड। तो अब तिब्‍बत का जो भी चोथा शरीर को उपलब्ध आदमी था। उसने सारी मेहनत इस बात पर की कि मरने के बाद हम किसी को क्‍या सहायता दे सकते हे। आप मर गये हे, मैं आपको प्रेम करता हूं, लेकिन मरने के बाद मैं आपको कोई सहायता नहीं पहुंचा सकता हूं। लेकिन तिब्‍बत में पूरी व्‍यवस्‍था है सात सप्‍ताह की….कि मरने के बाद सात सप्‍ताह तक उस आदमी को कैसे सहायता पहुंचायी जाये; और उसके कैसे गाइड (मार्गदर्शन) किया जाये; और उसको कैसे विशेष जन्‍म के लिए उत्‍प्रेरित किया जाये; और उसे कैसे विशेष गर्भ में प्रवेश में सहयोग किया जाये और किसी विशेष गर्भ में उसे पहुंचाया जाए।

अभी विज्ञान को वक्‍त लगेगा। कि वह इन सब बातों का पता लगाये; लेकिन यह लग जायेगा पता, उसमें अड़चन नहीं है। और फिर इसकी वैलिडिटी(प्रामाणिकता की जांच) के भी सब उन्‍होंने उपाय खोजें थे कि इसकी जांच कैसे हो।


प्रधान लामा के चुनाव की विधि—

तिब्‍बत में लामा जो है, पिछला लामा जो मरता है, वह बताकर जाता है कि अगला मैं किस घर में जन्‍म लुंगा। और तुम मुझे कैसे पहचान सकोगे। उसके सिंबल स (प्रतीक) दे जाता है। फिर उसकी खोज होती है। पूरे मुल्क में कि वह बच्‍चा अब कहां है। वह राज़ सिवाय उस आदमी के कोई बता नहीं सकता,जो बता गया था। तो यह जो लामा है। ऐसे ही खोजा गया। पिछला लामा कहकर गया था। इस बच्‍चे की खोज बहुत दिन करनी पड़ी। लेकिन आखिर वह बच्‍चा मिल गया। क्‍योंकि एक खास सूत्र था। जो कि हर गांव में जाकर चिल्‍लाया जायेगा। और जो बच्‍चा उसका अर्थ बता दे, वह समझ लिया जायेगा। कि वह पुराने लामा की आत्‍मा उसमें प्रवेश कर गयी; क्‍योंकि उसका अर्थ तो और किसी को पता ही नहीं था। वह ता बहुत सीक्रेट (गुप्‍त) मामला है।

तो चौथे शरीर के आदमी की पूरी क्‍यूरियोसिटि (जिज्ञासा) अगल थी। और अनंत है यह जगत। और अनंत है उसके राज, और अनंत है इसके रहस्‍य। अब ये जो लामा है इन्‍होंने पाँच में से चार प्रश्न के उत्‍तर ठीक दीये है। अब चार के उत्‍तर कोई इत्तफाक थोड़ ही हो सकता है। पांचवें का उत्‍तर वे सही न दे सके। पर पाँच उत्‍तर सही देने वाला पूरे तिब्‍बत में कहीं नहीं मिला। अब तो वहां सब चीन, और यूरोप के लोगों ने जा कर खत्‍म कर दिया। वरना तो तिब्‍बत का आदमी तिब्बत से बहार जन्‍म ले ही नहीं सकता था। हम ऐसा नहीं कर सकते। क्‍योंकि चेतना की गति तो प्रकाश की गति से भी तेज है। वह तो पल में कहां से कहा चली जाती है।

अभी जितनी साइंस को हमने जन्‍म दिया है। भविष्‍य में यही साइंस रहेगी, यह मत सोची ये, और नयी हजार साइंस पैदा हो जायेगी। क्‍योंकि और हजार आयाम है जानने के। और जब वह नहीं साइंसेस पैदा होंगी। तब वे कहेगी कि पुराने लोग वैज्ञानिक न रहे, वह यह क्‍यों नहीं बता पाये। नहीं हम कहेंगे; पुराने लोग भी वैज्ञानिक थे। उनकी जिज्ञासा ओर थी। जिज्ञासा का इतना फर्क है कि जिसका कोई हिसाब नहीं।

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अकबर ने एक दिन तानसेन को कहा, तुम्‍हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा ख्‍याल उठता है कि तुम जैसा गाने वाला शायद ही इस पृथ्‍वी पर कभी हुआ हो और न हो सकेगा। क्‍योंकि इससे ऊंचाई और क्‍या हो सकेगी। इसकी धारणा भी नहीं बनती। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्‍हें विदा किया था, और सोने लगा तब अचानक ख्‍याल आया। हो सकता है, तुमने भी किसी से सीखा है, तुम्‍हारा भी कोई गुरू होगा। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं। कि तुम्‍हारा कोई गुरू है? तुमने किसी से सीखा है?
तो तानसेन ने कहा, मैं कुछ भी नहीं हूं गुरु के सामने, जिससे सीखा है। उसके चरणों की धूल भी नहीं हूं। इसलिए वह ख्‍याल मन से छोड़ दो। शिखर? भूमि पर भी नहीं हूं। लेकिन आपने मुझ ही जाना है। इसलिए आपको शिखर मालूम पड़ता हूं। ऊँट जब पहाड़ के करीब आता है, तब उसे पता चलता है, अन्यथा वह पहाड़ होता ही है। पर तानसेन, ने कहां कि मैं गुरु के चरणों में बैठा हूं; मैं कुछ भी नहीं हूं। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्‍यता भी हो जाए, तो समझूंगा बहुत कुछ पा लिया।
तो अकबर ने कहा, तुम्‍हारे गुरु जीवित हों तो तत्‍क्षण, अभी और आज उन्‍हें ले आओ। मैं सुनना चाहूंगा।
पर तानसेन ने कहा: यही तो कठिनाई है। जीवित वे है, लेकिन उन्‍हें लाया नहीं जा सकता हे।
अकबर ने कहा, जो भी भेट करना हो, तैयारी है। जो भी। जो भी इच्‍छा हो, देंगे। तुम जो कहो, वहीं देंगे। तानसेन ने कहा, वही कठिनाई है, क्‍योंकि उन्‍हें कुछ लेने को राज़ी नहीं किया जा सकता। क्‍योंकि वह कुछ लेने का प्रश्‍न ही नहीं है।
अकबर ने कहा, कुछ लेने का प्रश्‍न नहीं है तो क्‍या उपाय किया जाए? तानसेन ने कहा, कोई उपाय नहीं, आपको ही चलना पड़े। तो उन्‍होंने कहा,मैं अभी चलने को तैयार हूं।
तानसेन ने कहा, अभी चलने से तो कोई सार नहीं है। क्‍योंकि कहने से वह गायें गे नहीं। ऐसा नहीं है वे गाते बजाते नहीं है। तब कोई सन ले बात और है। तो मैं पता लगाता हूं, कि वह कब गाते-बजाते है। तब हम चलेंगे।
पता चला—हरिदास फकीर उसके गुरू थे। यमुना के किनारे रहते थे। पता चला रात तीन बजे उठकर वह गाते है। नाचते हे। तो शायद ही दुनिया के किसी अकबर की हैसियत के सम्राट ने तीन बजे रात चोरी से किसी संगीतज्ञ को सुना हो। अकबर और तानसेन चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठ गये। पूरी रात इंतजार करेने के बाद सुबह जब बाबा हरिदास ने भक्ति भाव में गीत गया और मस्‍त हो कर डोलने लगे। तब अकबर की आंखों से झर-झर आंसू गिर रहे थे। वह केवल मंत्र मुग्ध हो कर सुनते रहे एक शब्‍द भी नहीं बोले।
संगीत बंद हुआ। वापस घर जाने लगे। सुबह की लाली आसमान पर फैल रही थी। अकबर शांत मौन चलते रहे। रास्‍ते भर तानसेन से भी नहीं बोले। महल के द्वार पर जाकर तानसेन से केवल इतना कहां- अब तक सोचता था कि तुम जैसा कोई भी नहीं गा बजा सकता है। यह मेरा भ्रम आज टुट गया। अब सोचता हूं कि तुम हो कहां। लेकिन क्‍या बात है? तुम अपने गुरु जैसा क्‍यों नहीं गा सकते हो?
तानसेन न कहा, बात तो बहुत साफ है। मैं कुछ पाने की लिए बजाता हूं और मेरे गुरु ने कुछ पा लिया है। इसलिए बजाते गाते है। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्‍य है। जो मुझे मिल उसमें मेरे प्राण है। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो पाते। बजाते-गाते समय में सदा अधूरा रहता हूं। अंश हूं। अगर बिना गाए-बजाएं भी मुझे वह मिल जाए जो गाने से मिलता है। तो गाने-बजाने को फेंककर उसे पा लुंगा। गाने मेरे लिए साधन है। साध्‍य नहीं। साध्‍य कहीं और है—भविष्‍य में, धन में, यश में, प्रतिष्‍ठा में—साध्‍य कहीं और है। संगीत सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्‍मा नहीं बन सकता; साध्‍य में ही आत्‍मा का वास होता है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाए, तो साध को छोड़ दूँ अभी। लेकिन नहीं मिलता साधन के बिना, इसलिए साधन को खींचता हूं। लेकिन दृष्‍टि और प्राण और आकांशा ओर सब घूमता है साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे है। संगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी है जिसे पाने को वह गा-बजा रहे हे। बल्‍कि पीछे कुछ है। वह बह रहा है। जिससे उनका संगीत फूट रहा है। और बज रहा है। कुछ पा लिया है, कुछ भर गया है। वह बह रहा है। कोई अनुभूति, कोई सत्‍य, कोई परमात्‍मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है। पैमाना छलक रहा है आनंद का। उत्‍सव का।
अकबर बार-बार पूछने लगा, किस लिए? किस लिए?
स्‍वभावत: हम भी पूछते है। किस लिए? पर तानसेन ने कहा, नदिया किस लिए बह रही है? फूल किस लिए खिल रहे है? चाँद-सूरज किस लिए चमक रहे है? जीवन किस लिए बह रहा है?
किस लिए मनुष्‍य की बुद्धि ने पैदा किया है । सारा जगत ओवर फ्लोइंग है, आदमी को छोड़कर। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा है। सारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहे। खिलनें का आनंद है। सूर्य निकलता है। निकलने में आनंद है। पक्षी गीत गा रहे है। गाने में आनंद है। हवाएँ बह रही है, चाँद-तारे,आकाश गंगाए चमक रही है। चारों तरफ एक उत्सव का माहौल है। पर आदमी इसके बीच कैसा पत्थर और बेजान सा हो गया है। आनंद अभी है, यही है, स्‍वय में विराजने में है अपने होने में है। अभी और यही। ऐसे थे फकीर संत हरी दास।

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एक जंगल की राह से एक जौहरी गुजर रहा था। देखा उसने राह में। एक कुम्‍हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चला आ रहा है। चकित हुआ। ये देख कर की ये कितना मुर्ख है। क्‍या इसे पता नहीं है की ये लाखों का हीरा है। और गधे के गले में सजाने के लिए बाँध रखा है। पूछा उसने कुम्‍हार से, सुनो ये पत्‍थर जो तुम गधे के गले में बांधे हो इसके कितने पैसे लोगे? कुम्‍हार ने कहां महाराज इस के क्‍या दाम पर चलो आप इस के आठ आने दे दो। हमनें तो ऐसे ही बाँध दिया था। की गधे का गला सुना न लगे। बच्‍चों के लिए आठ आने की मिठाई गधे की और से ल जाएँगे। बच्‍चे भी खुश हो जायेंगे और शायद गधा भी की उसके गले का बोझ कम हो गया है। पर जौहरी तो जौहरी ही था, पक्‍का बनिया, उसे लोभ पकड़ गया। उसने कहा आठ आने तो थोड़े ज्‍यादा है। तू इस के चार आने ले ले।

कुम्‍हार भी थोड़ा झक्‍की था। वह ज़िद्द पकड़ गया कि नहीं देने हो तो आठ आने नहीं देने है तो कम से कम छ: आने तो दे ही दो, नहीं तो हम नहीं बचेंगे। जौहरी ने कहा पत्‍थर ही तो है चार आने कोई कम तो नहीं। और सोचा थोड़ी दुर चलने पर आवाज दे देगा। आगे चला गया। लेकिन आधा फरलांग चलने के बाद भी कुम्हार ने उसे आवज न दी तब उसे लगा बात बिगड़ गई। नाहक छोड़ा छ: आने में ही ले लेता तो ठीक था। जौहरी वापस लौटकर आया। लेकिन तब तक बाजी हाथ से जा चुकी थी। गधा खड़ा आराम कर रहा था। और कुम्हार अपने काम में लगा था। जौहरी ने पूछा क्‍या हुआ। पत्‍थर कहां है। कुम्‍हार ने हंसते हुए कहां महाराज एक रूपया मिला है उस पत्‍थर का। पूरा आठ आने का फायदा हुआ है। आपको छ आने में बेच देता तो कितना घाटा होता। और अपने काम में लग गया।

पर जौहरी के तो माथे पर पसीना आ गया। उसका तो दिल बैठा जा रहा था सोच-सोच कर। हया लाखों का हीरा यूं मेरी नादानी की वजह से हाथ से चला गया। उसने कहा मूर्ख, तू बिलकुल गधे का गधा ही रहा। जानता है उस की कीमत कितनी है वह लाखों का था। और तूने एक रूपये में बेच दिया, मानो बहुत बड़ा खजाना तेरे हाथ लग गया।

उस कुम्‍हार ने कहां, हुजूर में अगर गधा न होता तो क्‍या इतना कीमती पत्‍थर गधे के गले में बाँध कर घूमता। लेकिन आपके लिए क्‍या कहूं? आप तो गधे के भी गधे निकले। आपको तो पता ही था की लाखों का हीरा है। और आप उस के छ: आने देने को तैयार नहीं थे। आप पत्‍थर की कीमत पर भी लेने को तैयार नहीं हुए।

यदि इन्सान को कोई वास्तु आधे दाम में भी मिले तो भी वो उसके लिए मोलभाव जरुर करेगा, क्योकि लालच हर इन्सान के दिल में होता है . कहते है न चोर चोरी से जाये हेरा फेरी से न जाये. जोहरी ने अपने लालच के कारण अच्छा सोदा गवा दिया

धर्म का जिसे पता है; उसका जीवन अगर रूपांतरित न हो तो उस जौहरी की भांति गधा है। जिन्‍हें पता नहीं है, वे क्षमा के योग्‍य है, लेकिन जिन्‍हें पता है। उनको क्‍या कहें?

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सब तीर्थ बहुत ख्‍याल से बनाये गए है। अब जैसे कि मिश्र में पिरामिड है। वे मिश्र में पुरानी खो गई सभ्‍यता के तीर्थ है। और एक बड़ी मजे की बात है कि इन पिरामिड के अंदर....। क्‍योंकि पिरामिड जब बने तब, वैज्ञानिको का खयाल है, उस काल में इलैक्ट्रिसिटी हो नहीं सकती।
आदमी के पास बिजली नहीं हो सकती। बिजली का आविष्‍कार उस वक्‍त कहां, कोई दस हजार वर्ष पुराना पिरामिड है, कई बीस हजार वर्ष पुराना पिरामिड है। तब बिजली का तो कोई उपाय नहीं था। और इनके अंदर इतना अँधेरा कि उस अंधेरे में जाने का कोई उपाय नहीं है। अनुमान यह लगाया जा सकता है कि लोग मशाल ले जाते हों, या दीये ले जाते हो। लेकिन धुएँ का एक भी निशान नहीं है इतने पिरामिड में कहीं । इसलिए बड़ी मुश्‍किल है। एक छोटा सा दीया घर में जलाएगें तो पता चल जाता है। अगर लोग मशालें भीतर ले गए हों तो इन पत्‍थरों पर कहीं न कहीं न कहीं धुएँ के निशान तो होने चाहिए। रास्‍ते इतने लंबे, इतने मोड़ वाले है, और गहन अंधकार है। तो दो ही उपाय हैं, या तो हम मानें कि बिजली रही होगी लेकिन बिजली की किसी तरह की फ़िटिंग का कहीं कोई निशान नहीं है। बिजली पहुंचाने का कुछ तो इंतजाम होना चाहिए। दूसरा आदमी सोच सकता है—तेल, धी के दीयों या मशालों का। पर उन सबसे किसी न किसी तरह के निशान पड़ते है, जो कहीं भी नहीं है। फिर उनके भीतर आदमी कैसे जाता रहा है, कोई कहेगा— नहीं जाता होगा, तो इतने रास्‍ते बनाने की कोई जरूरत नहीं है। पर सीढ़ियाँ है, रास्‍ते है, द्वार है, दरवाजे है, अंदर चलने फिरने का बड़ा इंतजाम हे। एक-एक पिरामिड में बहुत से लोग प्रवेश कर सकते है, बैठने के स्‍थान है अंदर। वह सब किस लिए होंगे। यह पहेली बनी रह गई हे। और साफ नहीं हो पाएगी कभी भी। क्‍योंकि पिरामिड की समझ नहीं है साफ, कि ये किस लिए बनाए गए है? लोग समझते है, किसी सम्राट का फितूर होगा, कुछ और होगा।
लेकिन ये तीर्थ है। और इन पिरामिड में प्रवेश का सूत्र ही यही है, कि जब कोई अंतर अग्‍नि पर ठीक से प्रयोग करता है तो उसका शरीर आभा फेंकने लगता है। और तब वह अंधेरे में प्रवेश कर सकता है। तो न तो यहां बिजली उपयोग की गई है, न यहां कभी दीया उपयोग किया गया है। न मशाल का उपयोग किया गया है। सिर्फ शरीर की दीप्‍ति उपयोग कि गई थी। लेकिन वह शरीर की दीप्ति अग्‍नि के विशेष प्रयोग से ही होती है। इनमें प्रवेश ही वही करेगा। जो इस अंधकार में मजे से चल सके। वह उसकी कसौटी भी है। परीक्षा भी है, और उसको प्रवेश का हक भी है। वह हकदार भी है।
जब पहली बार 1905 या 10 में एक-एक पिरामिड खोजा जो रहा था तो जो वैज्ञानिक उस पर काम कर रहा था उसका सहयोगी अचानक खो गया। बहुत तलाश की गई कुछ पता न चला। यहीं डर हुआ कि वह किसी गलियारे में अंदर है। बहुत प्रकाश और सर्च लाईट ले जाकर खोजा, वह कोई चौबीस घंटे खोया रहा। चौबीस घंटे बाद, कोई रात दो बजे वह भागा हुआ आया, करीब पागल हालत में। उसने कहा, में टटोल कर अंदर जा रहा था। की कहीं मुझे दरवाजा मालूम पड़ा, मैं अंदर गया और फिर ऐसा लगा कि पीछे कोई चीज बंद हो गई। मैंने लौटकर देखा तो दरवाजा तो बंद हो चुका था। जब मैं आया तब खुला था। पर दरवाजा भी नहीं था कोई, सिर्फ खुला था। फिर इसके सिवाय कोई उपाय नहीं था कि में आगे चला जाऊँ, और मैं ऐसी अद्भुत चीजें देखकर लोटा हूं जिसका कोई हिसाब लगाना मुश्‍किल है।
वह इतनी देर गुम रहा, वह पक्‍का है, वह इतना परेशान लोटा है, पक्‍का है, लेकिन जो बातें वह कह रहा है वह भरोसे की नहीं है। कि ऐसी चीजें होंगी। बहुत खोजबीन की गई उस दरवाजे की, लेकिन दरवाजा दुबारा नहीं मिल सका। न तो वह यह बता पाया कि कहां से प्रवेश किया, न यह बता पाया कि वह कहां से निकला। तो समझा गया कि यहाँ तो वह बेहोश हो गया, या उसने कहीं सपना देखा। यहाँ वह कहीं सो गया। और कुछ समझने का चारा नहीं था।
लेकिन जो चीजें उसने कहीं थी वह सब नोट कर ली गयीं। उस साइकिक अवस्‍था में, स्वप्नवत् अवस्‍था में जो-जो उसने वहां देखीं। फिर खुदाई में कुछ पुस्‍तकें मिलीं जिनमें उन चीजों का वर्णन भी मिला, तब बहुत मुसीबत हो गई। उस वर्णन से लगा कि वह चीजें किसी कमरे में वहां बंद है, लेकिन उस कमरे का द्वार किसी विशेष मनोदशा में खुलता है। अब इस बात की संभावना है कि वह ऐ सांयोगिक घटना थी कि इसकी मनोदशा वैसी रही हो। क्‍योंकि इसे तो कुछ पता नहीं था। लेकिन द्वार खुला अवश्‍य। तो जिन गुप्‍त तीर्थों की मैं बात कर रहा हूं उनके द्वार है, उन तक पहुंचने की व्‍यवस्‍थाएं है। लेकिन उस सबके आंतरिक सूत्र है। इन तीर्थों में ऐसा सारा इंतजाम है कि जिनका उपयोग करके चेतना गतिमान हो सके। जैसे कि पिरामिड के सारे कमरे, उनका आयतन एक हिसाब में हे। कभी आपने ख्‍याल किया, कहीं छप्‍पर बहुत नीचा हो, लेकिन आपके सिर को नहीं छू रहा हो, और यही छप्‍पर थोड़ा सरक कर नीचे आने लगे। हमको दबाएगा नहीं हम से अभी दो फिट ऊँचा है, लेकिन हमें आभास होगा कि हमारे भीतर कोई चीज दबने लगी।
जब नीचे छप्‍पर में आप प्रवेश करते है, तो आपके भीतर कोई चीज सिकुड़ती है। और आप जब बड़े छप्‍पर के नीचे प्रवेश करते है तो आपके भीतर कोई चीज फैलती हे। कमरे का आयतन इस ढंग से निर्मित किया जा सकता है , ठीक उतना किया जा सकता है जितने में आपको ध्यान आसान हो जाए। सरलतम हो जाए ध्‍यान आपको, उतना आयतन निर्मित किया जा सकता है। उतना आयतन खोज लिया गया था। उस आयतन का उपयोग किया जा सकता है। आपके भी सिकुडने ओर फैलने के लिए। उस कमरे के भीतर रंग, उस कमरे के भीतर गंध, उस कमरे के भीतर ध्‍वनि— इस सबका इंतजाम किया जा सकता है। जो आपके ध्‍यान के लिए सहयोगी हो जाए।
सब तीर्थों का अपना संगीत था। सच तो यह है कि सब संगीत, तीर्थों में पैदा हुए। और सब संगीत साधकों ने पैदा किए। सब संगीत किसी दिन मंदिर में पैदा हुए, सब नृत्‍य किसी दिन मंदिर में पैदा हुए। सब सुगंध पहली दफा मंदिर में उपयोग की गई। एक दफा जब यह बात पता चल गई कि संगीत के माध्‍यम से कोई व्‍यक्‍ति परमात्‍मा की तरफ जा सकता है। तो संगीत के माघ्‍यम से परमात्‍मा के विपरीत भी जा सकता है, यह भी ख्‍याल में आ गया। और तब बाद में दूसरे संगीत खोजें गए। किसी गंध से जब कि परमात्‍मा की तरफ जाया जा सकता है। तो विपरीत किसी गंध से कामुकता की तरफ जाया जा सकता है। गंधें भी खोज ली गई। किसी विशेष आयतन में ध्‍यानस्‍थ हो सकता है तो किसी विशेष आयतन में ध्‍यान से रोका जा सकता है। वह भी खोज लिया गया।
जैसे अभी चीन में ब्रेन वाश के लिए जहां कैदियों को खड़ा करते है, उस कोठरी का एक विशेष आयतन है। उस विशेष आयतन में ही खड़ा करते है। और उन्‍होंने अनुभव किया कि उस आयतन में कभी- बेशी करने से ब्रेन वाश करने में मुसीबत पड़ती है। एक निश्चित आयतन , हजारों प्रयोग करके तय हो गया कि इतनी ऊंची, इतनी चौड़ी इतनी आयतन की कोठरी में कैदियों को खड़ा कर दो तो कितनी देर में डिटीरीओरेशन हो जाएगा। कितनी देर में खो देगा वह अपने दिमाग को। फिर उसमें एक विशेष ध्‍वनि भी पैदा करो तो और जल्‍दी खो देगा। खास जगह उसके मस्‍तिष्‍क पर हेमरिंग करो तो और जल्दी खो देगा।
वे कुछ नहीं करते, एक मटका ऊपर रख देते है और एक-एक बूंद पानी उसकी खोपड़ी पर टपकता रहता है। उसकी अपनी लय है रिदिम है.....बस, टप-टप वह पानी सर पर टपकता रहता है। चौबीस घंटे वह आदमी खड़ा है, बैठ भी नहीं सकता, हिल भी आयतन इतना है कोठरी का लेट भी नहीं सकता। वह खड़ा है। मस्‍तिष्‍क में पानी टप-टप गिरता जा रहा है। आधा घंटा पूरे होते-होते तीस मिनट पूरे होते-होते सिवाय टिप-टिप की आवाज के कुछ नहीं बचता। आवाज इतनी जोर से मालूम होने लगेगी जैसे पहाड़ गिर रहा है। अकेली आवाज रह जाएगी उस आयतन में और चौबीस घंटे में वह आपके दिमाग को अस्‍त–व्‍यस्‍त कर देगी। चौबीस घंटे के बाद जब आपको बाहर निकालेंगे तो आप वहीं आदमी नहीं होगें। उन्‍होंने आपको सब तरह से तोड़ दिया है।
ये सारे के सारे प्रयोग पहली दफा तीर्थों में खोजें गए, मंदिरों में खोजें गए। जहां से आदमी को सहायता पहुँचाई जा सके। मंदिर के घंटे है, मंदिर की ध्वनियों है, धूप है, गंध है, फूल है, सब नियोजित था। और एक सातत्य रखने की कोशिश की गई। उसकी कंटीन्युटी न टूटे, बीच में कहीं कोई व्‍यवधान न पड़े अहर्निश धारा उसकी जारी रखी जाती रही। जैसे सुबह इतने वक्‍त आरती होगी, इतनी देर चलेगी। इस मंत्र के साथ होगी। दोपहर आरती होगी। इतनी देर चलेगी। इस मंत्र के साथ होगी। सांझ आरती होगी, इतनी देर चलेगी, यह क्रम ध्‍वनियों का उस कोठरी में गूंजता रहेगा। पहला क्रम टूटे उसके पहले दूसरा रीप्लेस हो जाए। यह हजारों साल तक चलेगा।
जैसा मैंने कहा— पानी को अगर लाख दफा पानी बनाया जाए भाप बनाकर, तो जैसे उसकी क्‍वालिटी बदलती है अल्‍केमी के हिसाब से उसी प्रकार एक ध्‍वनि को लाखों दफा पैदा किया जाए एक कमरे में तो उस कमरे की पूरी तरंग, पूरी गुणवत्‍ता बदल जाती है। उसकी पूरी क्वालिटी बदल जाती है। उस के बीच व्‍यक्‍ति को खड़ा कर देना उसके पास खड़ा कर देना, उसके रूपांतरित होने के लिए आसानी जुटा देगा। और चूंकि हमारा सारा का सारा व्‍यक्‍तित्व को बदलने लगता है। और आदमी इतना बाहर है कि पहले बाहर से ही फर्क उसको आसान पड़ते है, भीतर के फर्क तो पहले बहुत कठिन पड़ते है। दूसरा उपाय था पदार्थ के द्वारा सारी ऐसी व्‍यवस्‍था दे देना कि आपके शरीर को जो-जो सहयोगी हो, वह हो जाए।

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जितने दूर का नाता होगा, उतना ही बच्‍चा सुंदर होगा। स्‍वस्‍थ होगा, बलशाली होगा। मेधावी होगा। इसलिए फिक्र की जाती रही कि भाई बहन का विवाह न हो। दूर संबंध खोजें जाते है। जिलों गोत्र का भी नाता न हो, तीन-चार पाँच पीढ़ियों का भी नाता न हो। क्‍योंकि जितने दूर का नाता हो, उतना ही बच्‍चे के भीतर मां और पिता के जो वीर्याणु और अंडे का मिलन होगा, उसमें दूरी होगी तो उस दूरी के कारण ही व्‍यक्‍तित्‍व में गरिमा होती है।

इसलिए मैं इस पक्ष में हूं कि भारतीय को भारतीय से विवाह नहीं करना चाहिए; जापनी से करे, चीनी से करे, तिब्‍बती से करे, इरानी से करे, जर्मन से करे, भारतीय से न करे। क्‍योंकि जब दूर ही करनी है जितनी दूर हो उतना अच्‍छा।

और अब तो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है बात। पशु-पक्षियों के लिए हम प्रयोग भी कर रहे है। लेकिन आदमी हमेशा पिछड़ा हुआ होता है। क्‍योंकि उसकी जकड़ रूढ़ि गत होती है। अगर हमको अच्‍छी गाय की नस्‍ल पैदा करनी है तो हम बाहर से वीर्य-अणु बुलाते है। अंग्रेज सांड का वीर्य अणु बुलाते है। भारतीय गाय के लिए। और कभी नहीं सोचते कि गऊ माता के साथ क्‍या कर रहे हो तुम यह। गऊ माता और अंग्रेज पिता, शर्म नहीं आती। लाज-संकोच नहीं। मगर उतने ही स्‍वस्‍थ बच्‍चे पैदा होंगे। उतनी ही अच्‍छी नस्‍ल होगी।

इसलिए पशुओं की नसलें सुधरती जा रही है, खासकर पश्‍चिम में तो पशुओं की नसलें बहुत सधुर गई है। कल्‍पनातीत,साठ-साठ लीटर दूध देने वाली गायें कभी दूनिया में नहीं थी। और उसका कुल कारण यह है कि दूर-दूर के वीर्याणु को मिलाते जाते है। हर बार। आने वाले बच्‍चे और ज्‍यादा स्‍वास्‍थ और भी स्वारथ होते जाते है। कृतों की नसलों में इतनी क्रांति हो गई है कि जैसे कुत्ते कभी नहीं थे दुनियां में। रूस में फलों में क्रांति हो गई हे। कयोंकि फलों के साथ भी यही प्रयोग कर रहे है। आज रूस के पास जैसे फल है, दुनिया में किसी के पास नहीं है। उनके फल बड़े है, ज्‍यादा रस भरे है, ज्‍यादा पौष्‍टिक हे। और सारी तरकीब एक है: जितनी ज्‍यादा दूरी हो।
भारत की दीन हीनता में यह भी एक कारण है। भारत के लोच-पोच आदमियों में यह भी एक कारण है। क्‍योंकि जैन सिर्फ जैनों के साथ ही विवाह करेंगे। अब जैनों की कुल संख्‍या तीस लाख है। महावीर को मरे पच्‍चीस सौ साल हो गए। अगर महावीर ने तीस जोड़ों को संन्‍यास दिया होता तो तीस लाख की संख्‍या हो जाती। तीस जोड़े काफ़ी थे। तो अब जैनों का सारा संबंध जैनों से ही होगा। और जैनों में भी, श्‍वेतांबर का श्‍वेतांबर से और दिगंबर का दिगंबर से। और सब श्‍वेतांबर से नहीं तेरा पंथी का तेरा पंथी से और स्‍थानक वासी का स्‍थानक वासी से। और छोटे-छोटे टुकड़े है। संख्‍या हजारों में रह जाती है। और उन्हीं के भीतर गोल-गोल घूमते रहते है लोग। छोटे-छोटे तालाब है और उन्‍हीं के भीतर लोग बच्‍चे पैदा करते रहते है। इससे कचरा पैदा होता है। सारी दुनिया में सबसे ज्‍यादा कचरा इस भारत में है। फिर तुम रोते हो कि यह अब कचरे का क्‍यों पैदा हो रहा है। तुम खुद इस के जिम्‍मेदार हो।

ब्राह्मण सिर्फ ब्राह्मणों से शादी करेंगे। और वह भी सभी ब्राह्मणों से नहीं; कान्‍यकुब्‍ज ब्राह्मण कान्‍यकुब्‍ज से करेंगे। और देशस्‍थ -देशस्‍थ से, और कोंकणस्‍थ -कोंकणस्‍थ से। और स्‍वास्‍थ ब्राह्मण तो मिलते ही कहां हे। मुझे तो अभी तक नहीं मिला। कोई भी। और असल में, स्‍वस्‍थ हो उसी को ब्राह्मण कहना चाहिए। स्‍वयं में स्‍थित हो, वही ब्राह्मण है।

और यह जो भारत की दुर्गति है, उसमें एक बुनियादी कारण यह भी है कि यहां सब जातियां अपने-अपने धेरे में जी रही हे। यहीं बच्‍चे पैदा करना, कचड़ -बचड़ वही होती रहेगी। थोड़ा-बहुत बचाव करेंगे। मगर कितना बचाव करोगे। जिससे भी शादी करोगे। दो चार पाँच पीढ़ी पहले उससे तुम्‍हारे भाई-बहन का संबंध रहा होगा। दो चार पाँच पीढ़ी ज्‍यादा से ज्‍यादा कर सकते हो। इससे ज्‍यादा नहीं बचा सकते। जितना छोटा समाज होगा उतना बचाव करना कठिन हो जायेगा। जितना छोटा समाज होगा, उतनी संतति में पतन होगा। थोड़ा मुक्‍त होओ। ब्राह्मण को विवाह करने दो जैन से जैन को विवाह करने दो हरिजन से हरिजन को विवाह करेने दो मुसलमान से, मुसलमान को विवाह करने दो ईसाई से। तोड़ो ये सारी सीमाएं।
निकालों एक बार इस कुप से।
देखो फिर उँची संतति को।

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गंगा के प्रतीक को भी समझने जैसा है। गंगा के साथ हिंदू मन बड़े गहरे में जुड़ा है। गंगा को हम भारत से हटा लें, तो भारत को भारत कहना मुशिकल हो जाए । सब बचा रहे, गंगा हट जाए, भारत को भारत कहना मुशिकल हो जाए। गंगा को हटा ले तो भारत का साहित्य अधूरा पड़ जाए। गंगा को हम हटा ले तो हमारे तीर्थ ही खो जाए, हमारे सारे तीर्थ की भावना खो जाए।
गंगा के साथ भारत के प्राण बड़े पुराने दिनों से कमिटेड़ है। बड़े गहरे से जुडे है। गंगा जैसे हमारी आत्मा का प्रतीक हो गई है। मुल्क की भी अगर कोई आत्मा होती हो और उसके प्रतीक होते हो तो, गंगा ही हमारा प्रतीक है। पर क्या कारण होगा गंगा के इस गहरे प्रतीक बन जाने का कि हजारों-हजारों वर्ष पहले कृष्ण भी कहते है। नदियों में मैं गंगा हूं।
गंगा कोई नदियों में विशेष विशाल उस अर्थ में नहीं है। गंगा से बड़ी नदिया है। गंगा से लंबी नदिया है। गंगा से विशाल नदिया पृथ्वी पर है। गंगा कोई लंबाई में, विशालता में, चौड़ाई में किसी दृष्टि् से बहुत बड़ी गंगा नहीं है। कोई बहुत बड़ी नदी नहीं है। ब्रह्मपुत्र है, और अमेजान है, और ह्व्गांहो है। और सैकड़ों नदिया है। जिसके सामने गंगा फीकी पड़ जाए।
पर गंगा के पास कुछ और है, जो पृथ्वी पर किसी भी नदी के पास नहीं है। और उस कुछ के कारण भारतीय मन ने गंगा के साथ ताल-मेल बना लिया है। एक तो बहुत मजे की बात है। कि पूरी पृथ्वीं पर गंगा सबसे ज्यादा जीवंत नदी है, अलाइव। सारी नदियों का पानी आप बोतल में भर कर रख दें, सभी नदियों का पानी सड़ जाएगा। गंगा का नहीं सड़ेगा। केमिकली गंगा बहुत विशिष्ट है। उसका पानी डिटरिओरेट नहीं होता, सड़ता नहीं, वर्षों रखा रहे। बंद बोतल में भी वह अपनी पवित्रता, अपनी स्वच्छाता कायम रखता है।
ऐसा किसी नदी का पानी पूरी पृथ्वी पर नहीं है। सभी नदियों के पानी इस अर्थों में कमजोर है। गंगा का पानी इस अर्थ में विशेष मालूम पड़ता है। उसका विशेष केमिकल गुण मालूम पड़ता है।
गंगा में इतनी लाशें हम फेंकते है। गंगा में हमने हजारों-हजारों वर्षों से लाशें बहाई है। अकेले गंगा के पानी में, सब कुछ लीन हो जाता है, हड्डी भी। दुनिया की किसी नदी में वैसी क्षमता नहीं है। हड्डी भी पिघलकर लीन हो जाती है। और बह जाती है और गंगा को अपवित्र नहीं कर पाती। गंगा सभी को आत्मसात कर लेती है। हड्डी को भी। कोई भी दूसरे पानी में लाश को हम डालेंगे, पानी सड़ेगा। पानी कमजोर और लाश मजबूत पड़ती है। गंगा में लाश को हम डालते है, लाश ही बिखर जाती है। मिल जाती है अपने तत्वों में। गंगा अछूती बहती रहती है। उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
गंगा के पानी की बड़ी केमिकल परीक्षाएं हुई है । और अब तो यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो गया है कि उसका पानी असाधारण है।
यह क्यों है असाधारण, यह भी थोड़ी हैरानी की बात है, क्योंकि जहां से गंगा निकलती है वहां से बहुत नदियों निकलती है। गंगा जिन पहाड़ों से गुजरती है वहां से कई नदियों गुजरती है। तो गंगा में जो खनिज और जो तत्व मिलते है वे और नदियों में भी मिलते है। फिर गंगा में कोई गंगा का ही पानी तो नहीं होता, गंगोत्री से तो बहुत छोटी-सी धारा निकलती है। फिर और तो सब दूसरी नदियों का पानी ही गंगा में आता है। विराट धारा तो दूसरी नदियों के पानी की ही होती है।
लेकिन यह बड़े मजे की बात है कि जो नदी गंगा में नहीं मिली, उस वक्त उसके पानी का गुणधर्म और होता है। और गंगा में मिल जाने के बाद उसी पानी का गुण धर्म और हो जाता है। क्या होगा कारण? केमिकली तो कुछ पता नहीं चल पाता। वैज्ञानिक रूप से इतना तो पता चलाता है कि विशेषता है और उसके पानी में खनिज और कैमिकल्स का भेद है। विज्ञान इतना कहा सकता है। लेकिन एक और भेद है वह भेद विज्ञान के ख्याल में आज नहीं तो कल आना शुरू हो जाएगा। और वह भेद है, गंगा के पास लाखों-लाखों लोगों का जीवन की परम अवस्था को पाना।
यह मैं आपसे कहना चाहूंगा कि पानी जब भी कोई व्यक्ति, अपवित्र व्यक्ति पानी के पास बैठता है—अंदर जाने की तो बात अलग—पानी के पास भी बैठता है, तो पानी प्रभावित होता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों से आच्छादित हो जाता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों को अपने में ले लेता है।
इसलिए दुनिया के बहुत से धर्मों ने पानी का उपयोग किया है। ईसाइयत ने बप्तिसस्मा, बेप्टिाज्मग के लिए पानी का उपयोग किया है।
जीसस को जिस व्यक्ति ने बप्तिास्माय दिया, जान दि बैपटिस्ट ने, उस आदमी का नाम ही पड़ गया थ जान बप्तिस्मा वाला। वह जॉर्डन नदी में—और जॉर्डन यहूदियों के लिए वैसी ही नदी रही, जैसी हिंदुओं के लिए गंगा। वह जॉर्डन नदी में गले तक आदमी को डूबा देता, खुद भी पानी में डुबकर खड़ा हो जाता, फिर उसके सिर पर हाथ रखता और प्रभु से प्रार्थना करता उसके इनीशिएशन की, उसकी दीक्षा की।
पानी में क्यों खड़ा होता था जान? और पानी में दूसरे व्यक्ति को खड़ा करके क्या कुछ एक व्यंक्तिो की तरंगें और एक व्यक्ति के प्रभाव , एक व्यक्ति की आंतरिक दशा का आंदोलन दूसरे तक पहुंचना आसान है।
पानी बहुत शीध्रता से चार्ड्र हो जाता है। पानी बहुत शीध्रता से व्यक्ति से अनुप्राणित हो जाता है। पानी पर छाप बन जाती है।
लाखों-लाखों वर्ष से भारत के मनीषी गंगा के किनारे बैठकर प्रभु को पाने की चेष्टा करते रहे है। और जब भी कोई एक व्यक्ति ने गंगा के किनारे प्रभु को पाया है, तो गंगा उस उपलब्धि से वंचित नहीं रही है। गंगा भी आच्छादित हो जाती है। गंगा का किनारा, गंगा की रेत के कण-कण, गंगा का पानी, सब, इन लाखों वर्षों से एक विशेष रूप से स्प्रिचुअली चार्ज्ड, आध्यात्मिक रूप से तरंगायित हो गया है।
इसलिए हमने गंगा के किनारे तीर्थ बनाए।
गंगा साधारण नदी नहीं है। एक अध्यात्मिक यात्रा है और एक अध्यात्मिक प्रयोग। लाखों वर्षों तक लाखों लोगों को उसके निकट मुक्ति को पाना,परमात्मा‍ के दर्शन को उपलब्ध होना, आत्म-साक्षात्कार को पाना, लाखों का उसके किनारे आकर अंतिम घटना को उपलब्ध होना,वे सारे लोग अपनी जीवन-ऊर्जा को गंगा के पानी पर उसके किनारों पर छोड़ गए है।

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एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था। गधे के साथ, अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था। और गधा बड़ा स्‍वामीभक्‍त था।

लेकिन एक यात्रा पर गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी, और कब्र के पास बैठकर रो रहा था कि एक राहगीर गुजरा।

उस राहगीर ने सोचा कि जरूर किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी है। तो वह भी झुका कब्र के पास। इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे, उसने कुछ रूपये कब्र पर चढ़ाये। बंजारे को हंसी भी आई आयी। लेकिन तब तक भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी ठीक मालुमन पडा। और उसे यह भी समझ में आ गया कि यह बड़ा उपयोगी व्‍यवसाय है।

फिर उसी कब्र के पास बैठकर रोता, यही उसका धंधा हो गया। लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी। और गधे की कब्र किसी पहूंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी। ऐसे वर्ष बीते, वह बंजारा बहुत धनी हो गया।

फिर एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था। वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा। उसे भी लोगों ने कहा, ऐ महान आत्‍मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना। वह गया देखा उसने इस बंजारे को बैठा, तो उसने कहा, किसकी कब्र है यहा, और तू यहां बैठा क्‍यों रो रहा है। उस बंजारे ने कहां, अब आप से क्‍या छिपाना, जो गधा आप ने दिया था। उसी की कब्र है। जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया और मर कर और ज्‍यादा साथ दे रहा है। सुनते ही फकीर खिल खिलाकर हंसाने लगा। उस बंजारे ने पूछा आप हंसे क्‍यों? फकीर ने कहां तुम्‍हें पता है। जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भीएक पहूंचे हएं महात्‍मा की कब्र है। उसी से तो मेरा काम चलता है। बंजारे ने पूछा वह किस महात्‍मा की कब्र है। तुम्‍हें मालूम है। उसने कहां मुझे कैसे नहीं, पर क्‍या आप को मालूम है। नहीं मालूम हो सकता वह इसी गधे की मां की कब्र है।

धर्म के नाम पर अंधविश्‍वासों का बड़ा विस्‍तार है। धर्म के नाम पर थोथे, व्‍यर्थ के क्रियाकांड़ो, यज्ञों, हवनों का बड़ा विस्‍तार है। फिर जो चल पड़ी बात, उसे हटाना मुश्‍किल हो जाता है। जो बात लोगों के मन में बैठ गयी। उसे मिटाना मुश्‍किल हो जाता है। और इसे बिना मिटाये वास्‍तविक धर्म का जन्‍म नहीं हो सकता। अंधविश्‍वास उसे जलने ही न देगा।

सभी बुद्धिमान व्‍यक्‍तियों के सामने यही सवाल थे। और दो ही विकल्‍प है। एक विकल्‍प है नास्‍तिकता का, जो अंधविश्‍वास को इन कार कर देता है। और अंधविश्‍वास के साथ-साथ धर्म को भी इंकार कर देता है। क्‍योंकि नास्‍तिकता देखती है इस धर्म के ही कारण तो अंधविश्‍वास खड़े होते है। तो वह कूड़े-कर्कट को तो फेंक ही देती है। साथ में उस सोने को भी फेंक देती है। क्‍योंकि इसी सोने की बजह से तो कूड़ा कर्कट इक्‍कठ होता हे। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी

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इस सूत्र को ठीक से कोई साधक समझ ले...और मैं तो आपको इसीलिए कह रहा कि आपको साधना की दृष्टि से खयाल में आ जाए। अगर साधना की दृष्टि से खयाल में आ जाए, तो आप सब करके भी अकर्ता रह जाते हैं। आपने जो भी किया, अगर परमात्मा इतना करके और पीछे अछूता रह जाता है, तो आप भी सब करके पीछे अछूते रह जाते हैं। लेकिन इस सत्य को जानने की बात है, इसको पहचानने की बात है।

अगर इतना बड़ा संसार बनाकर परमात्मा पीछे गृहस्थ नहीं बन जाता, तो एक छोटा सा घर बनाकर एक आदमी गृहस्थ बन जाए, पागलपन है! इतने विराट संसार के जाल को खड़ा करके अगर परमात्मा वैसे का वैसा रह जाता है जैसा था, तो आप एक दुकान छोटी सी चलाकर और नष्ट हो जाते हैं? कहीं कुछ भूल हो रही है। कहीं कुछ भूल हो रही है। कहीं अनजाने में आप अपने कर्मों के साथ अपने को एक आइडेंटिटी कर रहे हैं, एक मान रहे हैं, तादात्म्य कर रहे हैं। आप जो कर रहे हैं, समझ रहे हैं कि मैं कर रहा हूं, बस कठिनाई में पड़ रहे हैं। जिस दिन आप इतना जान लेंगे कि जो हो रहा है वह हो रहा है, मैं नहीं कर रहा हूं, उसी दिन आप संन्यासी हो जाते हैं।

गृहस्थ मैं उसे कहता हूं, जो सोचता है, मैं कर रहा हूं। संन्यासी मैं उसे कहता हूं, जो कहता है, हो रहा है। कहता ही नहीं, क्योंकि कहने से क्या होगा? जानता है। जानता ही नहीं, क्योंकि अकेले जानने से क्या होगा? जीता है।

इसे देखें। मेरे समझाने से शायद उतना आसानी से दिखाई न पड़े जितना प्रयोग करने से दिखाई पड़ जाए। कोई एक छोटा सा काम करके देखें और पूरे वक्त जानते रहें कि हो रहा है, मैं नहीं कर रहा हूं। कोई भी काम करके देखें। खाना खाकर देखें। रास्ते पर चलकर देखें। किसी पर क्रोध करके देखें। और जानें कि हो रहा है। और पीछे खड़े देखते रहें कि हो रहा है। और तब आपको इस सूत्र का राज मिल जाएगा। इसकी सीक्रेट-की, इसकी कुंजी आपके हाथ में आ जाएगी। तब आप पाएंगे कि बाहर कुछ हो रहा है और आप पीछे अछूते वही के वही हैं जो करने के पहले थे, और जो करने के बाद भी रह जाएंगे। तब बीच की घटना सपने की जैसी आएगी और खो जाएगी।

संसार परमात्मा के लिए एक स्वप्न से ज्यादा नहीं है। आपके लिए भी संसार एक स्वप्न हो जाए, तो आप भी परमात्मा से भिन्न नहीं रह जाते। फिर दोहराता हूं-संसार परमात्मा के लिए एक स्वप्न से ज्यादा नहीं है, और जब तक आपके लिए संसार एक स्वप्न से ज्यादा है, तब तक आप परमात्मा से कम होंगे। जिस दिन आपको भी संसार एक स्वप्न जैसा हो जाएगा, उस दिन आप परमात्मा हैं। उस दिन आप कह सकते हैं, अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं

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जीवन प्रतिपल नया है। जीवन हर सांस में बदल रहा है। लेकिन हम और हमारा समाज-विशेषकर भारत में-ठहर सा गया है। इसमें कोई प्रवाह नहीं, कोई गतिशीलता नहीं। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हम जीवन से ही कट गये हैं। हम पुराने से पुराने हो गये हैं। एकदम ठूंठ। हम विकासमान विश्व के प्रवाह से अलग-थलग हो गये हैं और हम बुरी तरह पिछड़ गये हैं।
इस पुस्तक में ओशो हमें झकझोरते हुए कहते हैं : सारी दुनिया में नए को लाने का आमंत्रण है। हम नये को स्वीकार करते हैं ऐसे, जैसे कि पराजय हो ! इसीलिए पांच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति तीन सौ वर्ष, पचास वर्ष पुरानी संस्कृतियों के सामने हाथ जोड़ कर भीख मांगती है, और हमें कोई शर्म भी मालूम नहीं होती है। हम पांच हज़ार वर्षों में इस योग्य भी न हो सके, कि गेहूं पूरा हो सके, कि मकान पूरे हो सकें। अमरीका की कुल उम्र तीन सौ वर्ष है। तीन सौ वर्ष में अमरीका इस योग्य हो गया और कि सारी दुनिया के पेट को भरे।

और रूस की उम्र तो केवल सत्तर वर्ष ही है। सत्तर वर्ष की उम्र में रूस गरीब मुल्कों की कतार से हट कर अमीर मुल्कों की आखिरी कतार में खड़ा हो गया है। सत्तर वर्ष पहले जिसके बच्चे भूखे थे, आज उसके बच्चे चांद तारों पर जाने की योजनाएं बना रहे हैं। सत्तर सालों में क्या हो गया है ? कोई जादू सीख गये हैं वे ? जादू नहीं सीख गया है, उन्होंने एक राज़ सीख लिया है कि पुराने से चिपके रहने वाली कौम धीरे-धीरे मरती है, सड़ती है, गलती है।

भारत में हमारा चिंतन पुरातनवादी है, लेकिन हम एक बात भूल गए हैं कि यह जीवन का स्वभाव नहीं है। जीवन का विराट प्रवाह प्रतिपल परिवर्तनशील है, प्रगतिशील है। जीवन निरंतर नये प्रश्न खड़े करता है, नयी समस्याएं लाता है। लेकिन हम उन प्रश्नों और समस्याओं के उत्तर और समाधान गीता और कुरान में ढूंढ़ते हैं। इन ग्रंथों को कंठस्थ करके हम ज्ञानी तो हो जाते हैं, लेकिन हमारी एक भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है।

ओशो कहते हैं कि हमें फिर से अज्ञानी होने की हिम्मत जुटानी होगी। और यह सूत्र साधना के जगत में तो सर्वाधिक जरूरी है: हम मन के भीतर सब संगृहीत ज्ञान से मुक्त हों। पूरी तरह शून्य हों। मन, उसे पूरी तरह विदा कर दें।
पुराना जाना-पहचाना होत है, इसलिए मन उससे चिपके रहने का आग्रह करता है। उसमें उसकी सुरक्षा है।

जीवन प्रतिपल न केवल नया है बल्कि अनजाना भी है; मन को इसका सामना करने में असुरक्षा प्रतीत होती है। इसलिए हज़ारों वर्षों से हमारे देश को नये का साक्षात्कार करने का साहस नहीं रहा। आक्रमणकारी आते रहे, इसे गुलाम बनाते रहे और हम अपने घरों के बंद कमरों में बैठे गीता और वेद पढ़ते रहे, यज्ञ-हवन करते रहे। और जो दुर्गति होनी भी वह हुई।
प्रस्तुत पुस्तक नये का आग्रहपूर्वक निमंत्रण है। अगर भारत को नया होना है तो इस पुस्तक को प्रत्येक भारतीय के पास पहुंचना अत्यावश्यक है। आओ हम इस निमंत्रण को स्वीकार करें और जीवन का आलिंगन करने का साहस जुटाएं।

जीवन हमारी प्रतिपल प्रतीक्षा कर रहा है। हम इससे पलायन न करें। आओ हम जीवन के साथ लयबद्ध हों, नाचें, गाएं और उत्सव मनाएं। और स्मरण रहे ओशो कहते हैं; अगर हम अस्तित्व के सत्य को खोजने चले हैं तो सत्य भी आतुर है कि कोई आवश्यकता नहीं है। जितना विराट अज्ञात हो उसमें उतरने से उतनी ही विराट आत्मा तुम्हारी हो जाएगी। जितनी बड़ी चुनौती स्वीकार करोगे उतना ही बड़ा तुम्हारा नवजन्म हो जाएगा। तैयारी हो जीवन के आनंद को अंगीकार करने की तो आओ, द्वार खुले हैं; तो ओ, स्वागत है, तो आओ, बुलावा है, निमंत्रण है।

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गांधी गीता को माता कहते हैं, लेकिन गीता को आत्मसात नहीं कर सके। क्योंकि गाँधी की अहिंसा युद्ध की संभावनाओं को कहाँ रखेगी ? तो गांधी उपाय खोजते हैं, वह कहते हैं कि यह जो युद्ध है, यह सिर्फ रूपक है, यह कभी हुआ नहीं । यह मनुष्य के भीतर अच्छाई और बुराई की लड़ाई है। यह जो कुरुक्षेत्र है, यह कहीं कोई बाहर का मैदान नहीं है, और ऐसा नहीं है कि कृष्ण ने कहीं अर्जुन को किसी बाहर के युद्ध में लड़ाया हो। यह तो भीतर के युद्ध की रूपक-कथा है। यह ‘पैरबेल’ है, यह एक कहानी है। यह एक प्रतीक है। गांधी को कठिनाई है। क्योंकि गांधी का जैसा मन है, उसमें तो अर्जुन ही ठीक मालूम पडे़गा। अर्जुन के मन में बड़ी अहिंसा का उदय हुआ है। वह युद्ध छोड़कर भाग जाने को तैयार है। वह कहता है, अपनों को मारने से फायदा क्या ? और वह कहता है, इतनी हिंसा करके धन पाकर भी, यश पाकर भी, राज्य पाकर भी मैं क्या करूँगा? इससे तो बेहतर है कि मैं सब छोड़कर भिखमंगा हो जाऊँ। इससे तो बेहतर है कि मैं भाग जाऊँ और सारे दु:ख वरण कर लूँ, लेकिन हिंसा में न पड़ूँ। इससे मेरा मन बड़ा कँपता है। इतनी हिंसा अशुभ है।

कृष्ण की बात गांधी की पकड़ में कैसे आ सकती हैं ? क्योंकि कृष्ण उसे समझाते हैं कि तू लड़। और लड़ने के लिए जो-जो तर्क देते हैं, वह ऐसा अनूठा है कि इसके पहले कभी भी नहीं दिया गया था। उसको परम अहिंसक ही दे सकता है, उस तर्क को।

कृष्ण का यह तर्क है कि जब तक तू ऐसा मानता है कि कोई मर सकता है, तब तक तू आत्मवादी नहीं है। तब तक तुझे पता ही नहीं है कि जो भीतर है, वह कभी मरा है, न कभी मर सकता है। अगर तू सोचता है कि मैं मार सकूँगा, तो तू बड़ी भ्रांति में है, बड़े अज्ञान में है। क्योंकि मारने की धारणा ही भौतिकवादी की धारणा है। जो जानता है, उसके लिए कोई मरता नहीं है। तो अभिनय है- कृष्ण उससे कह रहे हैं-मरना और मारना लीला है, एक नाटक है।

इसलिए कृष्ण को जिन्होंने पूजा भी है, जिन्होंने कृष्ण की आराधना भी की है, उन्होंने भी कृष्ण के टुकड़े-टुकड़े करके किया है। सूरदास के कृष्ण कभी बच्चे से बड़े नहीं हो पाते। बड़े कृष्ण के साथ खतरा है। सूरदास बर्दाश्त न कर सकेंगे। वह बाल कृष्ण को ही..क्योंकि बालकृष्ण अगर गाँव की स्त्रियों को छेड़ आता है तो हमें बहुत कठिनाई नहीं है। लेकिन युवा कृष्ण जब गाँव की स्त्रियों को छेड़ देगा तो फिर बहुत मुश्किल हो जाएगा। फिर हमें समझना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि हम अपने ही तल पर तो समझ सकते हैं। हमारे अपने तल के अतिरिक्त समझने का हमारे पास कोई उपाय भी नहीं है। तो कोई है, जो कृष्ण के एक रूप को चुन लेगा; कोई है, जो दूसरे रूप को चुन लेगा। गीता को प्रेम करनेवाले भागवत की उपेक्षा कर जाएँगे, क्योंकि भागवत का कृष्ण और ही है। भागवत को प्रेम करनेवाले गीता की चर्चा में पड़ेगे, क्योंकि कहाँ राग-रंग और कहाँ रास और कहाँ युद्ध का मैदान ! उनके बीच कोई ताल-मेल नहीं है। शायद कृष्ण से बड़े विरोधों को एक-साथ पी लेनेवाला कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। इसिलए कृष्ण की एक-एक शक्ल को लोगों ने पकड़ लिया है। जो जिसे प्रीतिकर लगी है, उसे छांट लिया है, बाकी शक्ल को उसने इंकार कर दिया है।

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प्रेम अपने ढ़ंग से हिंसा करता है। प्रेमपूर्ण ढंग से हिंसा करता है। पत्नी, पति को प्रेमपूर्ण ढ़ंग से सताती है। पति, पत्नी को प्रेमपूर्ण ढ़ंग से सताता है। बाप, बेटे को प्रेमपूर्ण ढ़ंग से सताता है। और जब, सताना प्रेमपूर्ण हो तो बड़ा सुरक्षित हो जाता है। फिर सताने में बड़ी सुविधा मिल जाती है, क्योंकि हिंसा ने अहिंसा का चेहरा ओढ़ लिया है। शिक्षक विद्यार्थी को सताता है और कहता है, तुम्हारे हित के लिए ही सता रहा हूं। और जब किसी के हित के लिए सताते है, तब सताना बड़ा आसान है। वह गौरवान्वित, पुण्यकारी हो जाता है। इसलिए ध्यान रखना, दूसरे को सताने में हमारे चेहरे सदा साफ होते हैं। जो बड़ी-से-बड़ी हिंसा चलती है वह दूसरे साथ नहीं, वह अपनों के साथ चलती है।

सच तो यह है कि किसी को भी शत्रु बनाने के पहले मित्र बनाना अनिवार्य शर्त है। किसी को मित्र बनाने के लिए शत्रु बनाना अनिवार्य शर्त नहीं है। शर्त ही नहीं है। असल में शत्रु बनाने के लिए पहले मित्र बनाना जरूरी है। मित्र बनाये बिना शत्रु नहीं बनाया जा सकता। हां, मित्र बनाया जा सकता है बिना शत्रु बनाये। उसके लिए कोई शर्त नहीं है शत्रुता की। मित्रता से पहले चलती है।

अपनों के साथ जो हिंसा है, वह अहिंसा का गहरे से गहरा चेहरा है। इसलिए जिस व्यक्ति को हिंसा के प्रति जागना हो, उसे पहले अपनों के प्रति जो हिंसा है, उसके प्रति जागना होगा। लेकिन मैंने कहा कि किसी-किसी क्षण में दूसरा अपना मालूम पड़ता है। बहुत निकट हो गये हैं हम। यह निकट होना, दूर होना, बहुत तरल है। पूरे वक्त बदलता रहता है।
इसलिए हम चौबीस घंटे प्रेम में नहीं होते किसी के साथ। प्रेम सिर्फ क्षण होते हैं। प्रेम के घंटे नहीं होते है। प्रेम के दिन नहीं होते। प्रेम के वर्ष नहीं होते। मोमेंट ओनली। लेकिन क्षण जब हम क्षणो से स्थायित्व का धोखा देते हैं तो हिंसा शुरु हो जाती है। अगर मैं किसी को प्रेम करता हूँ तो यह क्षण की बात है। अगले क्षण भी करूंगा, जरुरी नहीं। कर सकूंगा, जरूरी नहीं। लेकिन अगर मैंने वायदा किया कि अगले क्षण भी प्रेम जारी रखूंगा, तो अगले क्षण जब हम दूर हट गये होंगे और हिंसा बीच में आ गई होगी तब हिंसा प्रेम का शक्ल लेगी। इसलिए दुनिया में जितनी अपना बनानेवाली संस्थाएं है, सब हिंसक हैं। परिवार से ज्यादा हिंसा और किसी संस्था ने नहीं की है, लेकिन उसकी हिंसा बड़ी सूक्ष्म है।

इसलिए अगर संन्यासी को परिवार छोड़ देना पड़ा, तो उसका कारण था। उसका कारण था-सूक्ष्मता हिंसा के बाहर हो जाना। और कोई कारण नहीं था, और कोई भी कारण नहीं था। सिर्फ़ एक ही कारण था कि हिंसा का एक सूक्ष्मतम जाल है जो अपना कहनेवाला कर रहे हैं। उनसे लड़ना भी मुश्किल है, क्योंकि वे हमारे हित में ही कर रहे हैं। परिवार का ही फैला हुआ बड़ा रूप समाज है इसलिए समाज ने जितनी हिंसा की है, उसका हिसाब लगाना कठिन है !

सच तो यह है कि समाज ने करीब-करीब व्यक्ति को मार डाला है ! इसलिए ध्यान रहे जब समाज आप समाज के सदस्य की हैसियत से किसी के साथ व्यवहार करने लगते हैं तब आप हिंसक होते हैं। आप जैन की तरह हैं तो आप हिंसक हैं मुसलमान की तरह व्यवहार करते हैं तो आप हिंसक हैं। क्योंकि अब आप व्यक्ति की तरह व्यवहार नहीं कर रहे, अब आप समाज की तरह व्यवहार कर रहे हैं। और अभी व्यक्ति ही अहिंसक नहीं हो तो समाज के अहिंसक होने की संभावना तो बहुत दूर है। समाज तो अहिंसक हो ही नहीं सकता इसलिए दुनिया में जो बड़ी हिंसाएं हैं, वह व्यक्तियों ने नहीं की हैं, वह समाज ने की हैं।

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मैंने सुना है कि एक बहुत बड़ा राजमहल था। आधी रात उस राजमहल में आग लग गयी। आंख वाले लोग बाहर निकल गये। एक अँधा आदमी राजमहल में था। वह द्वार टटोलकर बाहर निकलने का मार्ग खोजने लगा। लेकिन सभी द्वार बंद थे, सिर्फ एक द्वार खुला था। बंद द्वारों के पास उसने हाथ फैलाकर खोजबीन की और वह आगे बढ़ गया। हर बंद द्वार पर उसने श्रम किया, लेकिन द्वार बंद थे। आग बढ़ती चली गयी और जीवन संकट में पड़ता चला गया। अंतत: वह उस द्वार के निकट पहुंचा, जो खुला था। लेकिन दुर्भाग्य कि उस द्वार पर उसके सिर पर खुजली आ गयी ! वह खुजलाने लगा और उस समय द्वार से आगे निकल गया और फिर वह बंद द्वारों पर भटकने लगा !
अगर आप देख रहे हों उस आदमी को तो मन में क्या होगा ? कैसा अभागा था कि बंद द्वार पर श्रम किया और खुले द्वार पर भूल की-जहाँ से कि बिना श्रम के ही बाहर निकला जा सकता था ?

लेकिन यह किसी राजमहल में ही घटी घटना-मात्र नहीं है। जीवन के महल में भी रोज ऐसी घटना घटती है। पूरे जीवन के महल में अंधकार है, आग है। एक ही द्वार खुला है और सब द्वार बन्द हैं। बंद द्वार के पास हम सब इतना श्रम करते हैं, जिसका कोई अनुमान नहीं ! खुले द्वार के पास छोटी-सी भूल होते ही चूक जाते हैं ! ऐसा जन्म-जन्मांतरों से चल रहा है ! धन और यश द्वार हैं- वे बंद द्वार हैं, वे जीवन के बाहर नहीं ले जाते।
एक ही द्वार है जीवन के आगे लगे भवन में बाहर निकलने का और उस द्वार का नाम ‘ध्यान’ है। वह अकेला खुला द्वार है, जो जीवन की आग से बाहर ले जा सकता है।

लेकिन वह सिर पर खुजली उठ आती है, पैर में कीड़ा काट लेता है और कुछ हो जाता है और आदमी चूक जाता है ! फिर बंद द्वार हैं और अनंत भटकन है।

इस कहानी से अपनी बात मैं इसलिए शुरू करना चाहता हूं, क्योंकि उस खुले द्वार के पास कोई छोटी-सी चीज को चूक न जायें। और यह भी ध्यान रखें कि ध्यान के अतिरिक्त न कोई खुला द्वार कभी था और न है, न होगा। जो भी जीवन की आग के बाहर हैं, वे उसी द्वार से गये हैं। और जो भी कभी जीवन की आग के बाहर जायेगा, वह उसी द्वार से ही जा सकता है।
शेष सब द्वार दिखायी पड़ते हैं कि द्वार हैं, लेकिन वे बंद हैं। धन भी मालूम पड़ता है कि जीवन की आग के बाहर ले जायेगा, अन्यथा कोई पागल तो नहीं है कि धन को इकट्ठा करता रहे-लगता है कि द्वार है, दिखता भी है कि द्वार है ! द्वार नहीं है। दीवार भी दिखती तो अच्छा था, क्योंकि दीवार से हम सिर फोड़ने की कोशिश नहीं करते। लेकिन बंद द्वार पर तो अधिक लोग श्रम करते हैं कि शायद खुल जाये ! लेकिन धन से द्वार आज तक नहीं खुला है, कितना ही श्रम करें। वह द्वार बाहर ले जाता है और भीतर नहीं ले आता है।

ऐसे ही बड़े द्वार हैं-यश के, कीर्ति के, अहंकार के, पद के, प्रतिष्ठा के, वे कोई भी द्वार बाहर ले जाने वाले नहीं हैं। लेकिन जब हम उन बंद द्वारों पर खड़े हैं, उन्हें देखकर, पीछे जो उन द्वारों पर नहीं हैं, उन्हें लगता है कि शायद अब भी निकल जायेंगे ! जिसके पास बहुत धन है, निर्धन को देखकर लगता है। कि शायद धनी अब निकल जायेगा जीवन की पीड़ा से, जीवन के दु:ख से, जीवन की आग से, जीवन के अंधकार से। जो खड़े है बंद द्वार पर, वे ऐसा भाव करते हैं कि जैसे निकलने के करीब पहुंच गये।

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दो तीन बातें करना चाहूँगा। एक तो जातीय दंगे को साधारण मानना शुरू करना चाहिए। उसे जातीय दंगा मानना नहीं चाहिए, साधारण दंगा मानना चाहिए। और जो साधारण दंगे के साथ व्यवहार करते हैं वही व्यवहार उस दंगे के साथ भी करना चाहिए, क्योंकि जातीय दंगा मानने से कठिनाइयां शुरू हो जाती हैं, इसलिए जातीय दंगा मानने की जरूरत नहीं है। जब एक लड़का एक लड़की को भगाकर ले जाता है, वह मुसलमान हो कि हिन्दू, कि लड़की हिन्दू है कि मुसलमान है-इस लड़के और लड़की के साथ वही व्यवहार किया जाना चाहिए, जो कोई लड़का किसी लड़की को भगा कर ले जाये, और हो। इसको जातीय मानने का कोई कारण नहीं है।

जैसे चीन है-चीन में आप जातीय दंगा नहीं करवा सकते। कोई उपाय नहीं है। और कोई दंगे नहीं कर रहा ! जातीय दंगे नहीं करवा सकते चीन में। उसका कारण है कि कभी-कभी एक-एक घर में पांच-पांच रिलिजन के लोग हैं। दंगा करवाइए किससे, भड़काइएगा किसको ? बाप कंफ्यूशियस को मानता है, पत्नी, उसकी मां जो है, लाओत्से को मानती है, बेटा मुहम्मद को मानता है कोई बुद्धिस्ट है घर में, एक लड़की है-बहू जो है वह। तो चीन में एक-एक घर में कभी-कभी पांच-पांच धर्म के आदमी भी हैं। इसकी वजह से कंवर्शन नहीं होता। अगर लड़का हिन्दू है और स्त्री मुसलमान है, तो पत्नी मुसलमान होना जारी नहीं रख सकती। मेरा मतलब समझे आप ? जब एक घर में पांच धर्मों के लोग हों, तो आप अलग करवाइगा कैसे ? किसके साथ दंगा करवाइगा ? डिमार्केशन मुश्किल हो जाता है। हिन्दुस्तान में डिमार्केशन आसान है-यह हिन्दू है, यह मुसलमान है, यह साफ मामला है। मुसलमान अगर मरता है तो मेरी तो पत्नी मरती है, मेरी बहन मरती है, कोई नहीं मरता है, मुसलमान मरता है।

और हम, जो इस मुल्क में जातीय दंगों को खत्म करना चाहते हैं, इतनी ज्यादा जातीयता की बात करते हैं कि हम उसे रिकग्रीशन देना शुरू कर देते हैं। इसलिए पहली बात तो यह है कि जातीयता को राजनीति के द्वारा किसी तरह का रिकग्रीशन नहीं होना चाहिए। राज्य की नजरों में हिन्दू या मुसलमान का कोई फर्क नहीं होना चाहिए।
लेकिन हमारा राज्य खुद गलत बातें करता है। हिन्दू कोड़ बिल बनाया हुआ है, जो कि सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होगा, मुसलमान पर लागू नहीं होगा ! यह क्या बदतमीजी की बातें हैं ? कोई भी कोड़ हो तो पूरे नागरिकों पर लागू होना चाहिए। अगर ठीक है तो सब पर लागू होना चाहिए, ठीक नहीं है तो किसी पर लागू नहीं होना चाहिए। लेकिन जब आपका पूरा राज्य भी हिन्दुओं को अलग मानकर चलता है, मुसलमान को अलग मानकर चलता है, तो किस तल पर यह बात खत्म होगी ?

तो पहले तो हिन्दुस्तान की सरकार को साफतौर से तय कर लेना चाहिए कि हमारे लिए नागरिक के अतिरिक्त किसी का अस्तित्व नहीं है। और अगर ऐसा मुसलमान गुंडागिरी करता है तो एक नागरिक गुंडागिरी कर रहा है। जो उसके साथ व्यवहार होना चाहिए, वह होगा। यह मुसलमान का सवाल नहीं है। राज्य की नजरों से हिन्दू और मुसलमान का फासला खत्म होना चाहिए, पहली बात।
दूसरी बात-कि हिन्दू मुसलिम के बीच शांति हो, हिन्दू मुस्लिम का भाई-चारा तय हो, इस तरह की सब कोशिश बंद करनी चाहिए। यह कोशिश खतरनाक है। इसी कोशिश ने हिन्दुस्तान पाकिस्तान को बंटवाया। क्योंकि जितना हम जोर देते हैं कि हिन्दू मुस्लिम एक हों, उतना ही हर बार दिया गया जोर बताता है कि वे एक नहीं हैं। यह हालत वैसी है जैसे कि कोई आदमी किसी को भूलना चाहता हो, और क्योंकि भूलना चाहता है इसलिए भूलने के लिए हर बार याद करता है। और हर बार याद करता है तो उसकी याद मजबूत होती चली जाती है।

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